Thursday, October 8, 2026
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Maternity Rights: गेस्ट फैकल्टी या स्थायी फैकल्टी…मां बनना नौकरी की प्रकृति पर निर्भर नहीं, उन्हें भी मातृत्व अवकाश दें

Maternity Rights: ओडिशा हाई कोर्ट ने एक विश्वविद्यालय की ‘गेस्ट फैकल्टी’ (अतिथि शिक्षक) को मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) देने से इनकार करने पर कड़ी नाराजगी जताई है।

हाईकोर्ट के जस्टिस आदित्य कुमार महापात्रा ने विश्वविद्यालय द्वारा एक महिला शिक्षक की मातृत्व अवकाश याचिका खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इसे “भेदभावपूर्ण” और “कानूनन अमान्य” करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “मातृत्व का अधिकार” (Right to Motherhood) किसी महिला की नौकरी की प्रकृति (स्थायी या अस्थायी) पर निर्भर नहीं करता।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता एक विश्वविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी के रूप में कार्यरत थी। उसने मातृत्व अवकाश और उससे जुड़े वित्तीय लाभों के लिए आवेदन किया था।
  • यूनिवर्सिटी का तर्क: विश्वविद्यालय ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता एक ‘अस्थायी कर्मचारी’ है। ओडिशा सरकार के 2016 के एक ज्ञापन का हवाला देते हुए कहा गया कि संविदात्मक (Contractual) कर्मचारियों को यह लाभ नहीं मिलता।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “अजीब और भेदभावपूर्ण आधार”

  • हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालय के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
  • समानता का अधिकार: “महिला कर्मचारी का मातृत्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह स्थायी है या अस्थायी। स्थायी कर्मचारियों को राहत देना और अस्थायी को मना करना महिला कर्मचारियों के बीच भेदभाव पैदा करता है।”
  • यूनिवर्सिटी की गलती: कोर्ट ने पाया कि विश्वविद्यालय ने पिछली सुनवाई के दौरान दिए गए अदालती निर्देशों (अनिंदिता मिश्रा केस) को पूरी तरह नजरअंदाज किया और उन पर कोई चर्चा नहीं की।
  • नीतिगत फैसला: सरकार की मातृत्व अवकाश नीति सभी महिला कर्मचारियों के लिए एकसमान होनी चाहिए, चाहे उनकी नियुक्ति किसी भी प्रकार की हो।

कानूनन अमान्य (Unsustainable in Law)

अदालत ने अपने आदेश में कहा, विश्वविद्यालय इस सोच के साथ आगे बढ़ा कि अस्थायी कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश की आवश्यकता नहीं होती, जो कि पूरी तरह गलत है। कोर्ट ने खारिज करने वाले आदेश को क्वैश (Quash) कर दिया और मामले को वापस विश्वविद्यालय के पास भेज दिया।

आगे का निर्देश (The Deadline)

    • पुनर्विचार: विश्वविद्यालय को याचिकाकर्ता के दावे पर फिर से विचार करना होगा।
    • समय सीमा: इस आदेश की प्रति प्राप्त होने के 4 सप्ताह के भीतर आवश्यक आदेश पारित करना अनिवार्य है, ताकि महिला शिक्षक को उसके हक के लाभ मिल सकें।

    निष्कर्ष: कामकाजी महिलाओं के लिए बड़ी जीत

    यह फैसला ओडिशा ही नहीं, बल्कि देशभर की उन हजारों महिलाओं के लिए एक नजीर है जो गेस्ट फैकल्टी, एड-हॉक या संविदा पर काम कर रही हैं। ओडिशा हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मातृत्व जैसे जैविक और मानवीय अधिकारों को ‘नौकरी के कॉन्ट्रैक्ट’ की शर्तों में नहीं बांधा जा सकता।

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