Friday, October 2, 2026
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Justice for Job Seeker: सिस्टम की देरी, भुगते क्यों उम्मीदवार?”…ओवर-एज होने पर रेलवे अभ्यर्थी को मिले ₹5 लाख का मुआवजा, सभी का जवाब इस केस से समझें

Justice for Job Seeker: ओडिशा हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है, जिसे लंबी कानूनी लड़ाई के कारण सरकारी नौकरी के अवसर से हाथ धोना पड़ा।

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का रद्द

हाईकोर्ट के जस्टिस कृष्णा श्रीपाद दीक्षित और जस्टिस चितरंजन दास की बेंच ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने रेलवे में नियुक्ति के व्यक्ति के दावे को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने माना कि जब कोई ईमानदार याचिकाकर्ता न्यायिक देरी की वजह से ‘ओवर-एज’ (अधिक आयु) हो जाता है, तो उस अन्याय की भरपाई मौद्रिक मुआवजे से की जानी चाहिए।

मामला क्या था? (The Long Legal Battle)

  • विवाद: याचिकाकर्ता ने रेलवे में नियुक्ति न मिलने को चुनौती दी थी। विभाग का तर्क था कि वह ‘ओवर-एज’ हो गया है और पॉलिसी में बदलाव हो चुका है।
  • ट्रिब्यूनल की गलती: कैट (CAT) ने याचिकाकर्ता की अर्जी यह कहकर खारिज कर दी थी कि अब उसकी सेवाओं की जरूरत नहीं है और वह निर्धारित आयु सीमा पार कर चुका है।

कोर्ट का कड़ा रुख: “न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास की रक्षा”

  • हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले में तीन बड़ी खामियां गिनाईं।
  • गलत व्याख्या: कोर्ट ने कहा कि केवल ‘ओवर-एज’ होने के आधार पर किसी नागरिक को सार्वजनिक रोजगार के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने चंद्रशेखर सिंह बनाम झारखंड राज्य मामले में स्पष्ट किया है।
  • RTI का खुलासा: मुकदमेबाजी के दौरान ही रेलवे ने उसी श्रेणी में 31 अन्य लोगों को नियुक्त किया था। इससे विभाग का यह तर्क झूठा साबित हुआ कि “सेवाओं की आवश्यकता नहीं थी”।
  • अन्याय की भरपाई: “समय और ज्वार किसी का इंतजार नहीं करते। यदि मुकदमे के लंबित रहने के कारण याचिकाकर्ता को नुकसान हुआ है, तो कोर्ट का कर्तव्य है कि वह Ex Debito Justitiae (न्याय के हित में) उस अन्याय को दूर करे।”

मुआवजा ही क्यों? (The Rationale for ₹5 Lakh)

  • अदालत ने स्वीकार किया कि अब याचिकाकर्ता को नौकरी नहीं दी जा सकती क्योंकि वह उम्र के उस पड़ाव पर है जहाँ रोजगार संभव नहीं है।
  • भरपाई (Recompense): कोर्ट ने माना कि ₹5,00,000 की राशि उस अन्याय को “अन-डू” (Undo) करने के लिए पर्याप्त है जो सिस्टम की देरी के कारण हुआ।
  • न्याय की मिसाल: कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में राहत नहीं दी गई, तो आम आदमी का न्यायिक प्रक्रिया से भरोसा उठ जाएगा।

‘पॉलिसी’ पर स्पष्टीकरण

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ट्रिब्यूनल ने पॉलिसी गाइडलाइन्स को समझने में गलती की थी। रिकॉर्ड्स दिखाते हैं कि पुरानी और नई गाइडलाइन्स में कोई बड़ा बदलाव नहीं था, जिसे ट्रिब्यूनल ने नजरअंदाज कर दिया।

निष्कर्ष: उम्मीदवारों के लिए ढाल

ओडिशा हाई कोर्ट का यह फैसला उन लाखों युवाओं के लिए एक बड़ी उम्मीद है जो सालों तक अदालतों के चक्कर काटते हैं और अंततः ‘ओवर-एज’ होने का तमगा लेकर बाहर निकलते हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक और न्यायिक देरी की सजा केवल नागरिक को नहीं मिलनी चाहिए।

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