Wednesday, July 8, 2026
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Judicial Shocker: जज साहब को कानून का आइडिया नहीं…फिर पटना हाईकोर्ट ने ट्रायल जज से छीनीं शक्तियां, पढ़ें मामला

Judicial Shocker: पटना हाई कोर्ट ने शेखपुरा के एक ट्रायल कोर्ट जज के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें आपराधिक मुकदमों की सुनवाई से रोक दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्रशेखर झा की बेंच ने एक हत्या के मामले (2017) में पांच लोगों को बरी करते हुए एडिशनल सेशंस जज (ASJ-1, शेखपुरा) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने पाया कि जज ने पांच आरोपियों को केवल उनके ‘इकबालिया बयान’ (Confession) के आधार पर उम्रकैद की सजा सुना दी थी, जो कि कानूनन सबूत के तौर पर मान्य नहीं है।

मामला क्या था? (The Illegal Procedure)

  • घटना: जनवरी 2017 में शेखपुरा में एक जूनियर इंजीनियर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि मनरेगा (MNREGA) कार्यों में गलत प्रविष्टि करने से मना करने पर इंजीनियर की हत्या हुई।
  • ट्रायल कोर्ट का फैसला: जज ने पुलिस हिरासत में दिए गए आरोपियों के ‘इकबालिया बयानों’ को सबूत मानकर उन्हें धारा 302 (हत्या) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
  • हाई कोर्ट की फटकार: कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि एक सेशंस जज रैंक के अधिकारी को यह नहीं पता कि पुलिस के सामने दिया गया बयान कोर्ट में मान्य नहीं होता।

अवैध प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों का हनन

  • हाई कोर्ट ने अपने आदेश में जज की तीखी आलोचना की।
  • शून्य कानूनी ज्ञान: “हमें यह नोट करते हुए दुख हो रहा है कि ट्रायल जज को आपराधिक मुकदमे में सबूतों की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता का कोई अंदाजा नहीं है।”
  • अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि अमान्य सबूतों को स्वीकार कर जज ने आरोपियों को सालों तक जेल में रहने पर मजबूर किया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
  • गलत प्रक्रिया: कोर्ट ने इसे केवल ‘गलत’ नहीं बल्कि ‘अवैध प्रक्रिया’ (Illegal Procedure) करार दिया।

नए कानूनों की ट्रेनिंग का आदेश

  • पटना हाई कोर्ट ने मामले को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास प्रशासनिक विचार के लिए भेजते हुए सिफारिश की।
  • शक्तियां वापस ली जाएं: उक्त जज से तत्काल प्रभाव से आपराधिक मुकदमों की सुनवाई का अधिकार वापस लिया जाए।
  • स्पेशल ट्रेनिंग: जज को नए कानूनों— BNS (भारतीय न्याय संहिता), BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) और विशेष रूप से BSA (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) पर ‘विशेष प्रशिक्षण’ दिया जाना चाहिए।

सबूतों की कमी और आरोपियों की रिहाई

  • हाई कोर्ट ने पाया कि केस में लिए गए इकबालिया बयान गलत थे।
  • डाइंग डिक्लेरेशन (Dying Declaration): पीड़ित का मूल मृत्युपूर्व बयान कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया था।
  • पुलिस की लापरवाही: कोर्ट ने नोट किया कि एक SDPO रैंक के अधिकारी को भी यह नहीं पता था कि पुलिस हिरासत में इकबालिया बयान रिकॉर्ड नहीं कर सकती।

निष्कर्ष: न्यायिक जवाबदेही की मिसाल

पटना हाई कोर्ट का यह फैसला न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) की एक बड़ी मिसाल है। यह स्पष्ट करता है कि न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि कानून की बुनियादी समझ होना भी अनिवार्य है, ताकि किसी निर्दोष को ‘अवैध प्रक्रिया’ के कारण जेल न काटनी पड़े।

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