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Matrimonial War: यह शादी का नहीं, महाभारत का युद्ध है…वकील पति के दायर 80 मामले रद्द, पत्नी को 5 करोड़ रुपये की Alimony

Matrimonial War: सुप्रीम कोर्ट ने एक दशक से चल रहे एक वैवाहिक विवाद को ‘महाभारत का युद्ध’ करार देते हुए वकील पति को 5 करोड़ रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता (Alimony) देने का आदेश दिया है।

संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) का हुआ प्रयोग

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए इस विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि यह शादी पूरी तरह टूट चुकी है और अब इसे खींचना दोनों पक्षों के लिए मानसिक प्रताड़ना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी का उच्च शिक्षित या पेशेवर रूप से योग्य होना पति को उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता है। पीठ ने एक वकील को 5 करोड़ रुपये गुजारा भत्ता (एलिमनी) देने का आदेश दिया।

वकील पति ने पत्नी, रिश्तेदार व उसके वकील पर 80 से अधिक मुकदमे दर्ज किए

अदालत ने पाया कि उसने अपनी कानूनी विशेषज्ञता का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी, उसके परिवार और उसके वकीलों के खिलाफ 80 से अधिक मुकदमे दायर किए थे। अदालत ने ‘अपरिवर्तनीय वैवाहिक विघटन’ (irretrievable breakdown) के आधार पर विवाह को समाप्त कर दिया और उत्पीड़न का निर्णायक अंत करने के लिए सभी लंबित मामलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, यह एक अत्यंत उपयुक्त मामला है… न केवल विवाह को निरस्त करने के लिए… बल्कि आपसी रूप से शुरू किए गए और लंबित सभी मामलों, जिनमें रिश्तेदारों और वकीलों के खिलाफ मामले भी शामिल हैं, को समाप्त करने के लिए भी, ताकि पूर्ण न्याय किया जा सके और इस एक दशक पुराने विवाद को विराम दिया जा सके, जो सभी सीमाएं पार कर चुका है और महाभारत जैसी वैवाहिक लड़ाई का रूप ले चुका है।

“महाभारत” जैसी कानूनी लड़ाई

  • अदालत ने इस मामले की तुलना कुरुक्षेत्र के युद्ध से की।
  • मुकदमों की झड़ी: पति ने अपनी पत्नी, उसके परिवार और यहां तक कि उसके वकीलों के खिलाफ भी 80 से अधिक सिविल और आपराधिक मामले दर्ज करा रखे थे।
  • विवादास्पद आचरण: कोर्ट ने पति के आचरण को “प्रतिशोधी” (Vindictive) और “कर्कश” (Cantankerous) बताया। वह अपनी कानूनी जानकारी का उपयोग पत्नी को परेशान करने के लिए कर रहा था।
  • लंबा खिंचता केस: 2010 में हुई शादी 2016 से अलगाव में बदल गई थी, और तब से अदालतों के चक्कर काटे जा रहे थे।

5 करोड़ रुपये का हर्जाना और बच्चों की कस्टडी

  • सुप्रीम कोर्ट ने “पूर्ण न्याय” (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए कई निर्देश दिए।
  • स्थायी गुजारा भत्ता: पति को एक साल के भीतर 5 करोड़ रुपये देने होंगे। इसमें गुजारा भत्ता, भरण-पोषण और बच्चों की शिक्षा का खर्च शामिल है।
  • बच्चों की कस्टडी: दोनों नाबालिग बच्चों की कस्टडी पत्नी के पास रहेगी, पिता को केवल मिलने का अधिकार (Visitation Rights) होगा।
  • सभी केस खत्म: कोर्ट ने वकीलों और रिश्तेदारों के खिलाफ चल रहे सभी लंबित मामलों को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया।

पति के दावों को कोर्ट ने नकारा

  • शिक्षित पत्नी का तर्क: पति ने दलील दी थी कि पत्नी उच्च शिक्षित है और खुद कमा सकती है, इसलिए वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि बच्चों के भविष्य और पत्नी की वर्तमान स्थिति को देखते हुए पति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
  • आर्थिक तंगी का बहाना: पति ने दावा किया कि उसके पास पैसे नहीं हैं, लेकिन कोर्ट ने पाया कि उसने जानबूझकर अपने बिजनेस पदों से इस्तीफा दिया ताकि देनदारी से बच सके।
  • 20 करोड़ का उल्टा दावा: पति ने पत्नी से ही 20 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने बेतुका मानकर खारिज कर दिया।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयसुप्रीम कोर्ट का आदेश / निष्कर्ष
अनुच्छेद 142 का उपयोगशादी को आधिकारिक तौर पर समाप्त (Annul) कर दिया गया।
वसूली की राशि₹5 करोड़ (बच्चों की शिक्षा और पत्नी के सम्मानजनक जीवन के लिए)।
वकीलों की सुरक्षापति द्वारा पत्नी के वकीलों पर किए गए केस “तंग करने वाले” (Vexatious) माने गए और रद्द कर दिए गए।
बच्चों का हितबच्चों की पढ़ाई और विदेश (कनाडा) में रहने के खर्च को सर्वोपरि रखा गया।

निष्कर्ष: अदालती प्रताड़ना का अंत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग अपने जीवनसाथी को प्रताड़ित करने के लिए “हथियार” के रूप में करते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि जब वैवाहिक कड़वाहट “महाभारत” का रूप ले ले, तो बच्चों के भविष्य और न्याय के हित में कठोर और वित्तीय रूप से भारी निर्णय लेना जरूरी हो जाता है।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
VIKRAM NATH …J
SANDEEP MEHTA ….J.
CIVIL APPELLATE/INHERENT/ORIGINAL
JURISDICTION
CIVIL APPEAL NO(S). OF 2026
(@ SPECIAL LEAVE PETITION (CIVIL) NO(S). 28311 OF 2024)
XXX ….APPELLANT(S)
VERSUS
YYY ….RESPONDENT(S)
WITH
CONTEMPT PETITION(C) NO(S). 626-627 OF 2025
IN SLP(CIVIL) NO(S). 28311 OF 2024
CONTEMPT PETITION(C) NO(S). 657-658 OF 2025
IN SLP(CIVIL) NO(S). 28311 OF 2024
MISCELLANEOUS APPLICATION NO(S). 2161 OF 2025
IN WRIT PETITION(CIVIL) NO(S). 240 OF 2025
CIVIL APPEAL @ SLP(CIVIL) NO(S). 28311 OF 2024

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