Sunday, May 24, 2026
HomeSupreme CourtJustice for Sugna: खाना नहीं बनाने पर पति ने पत्नी की हत्या...

Justice for Sugna: खाना नहीं बनाने पर पति ने पत्नी की हत्या कर दी…सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह पितृसत्ता समाज नहीं ताे क्या है, पढ़ें दर्दनाक केस को

Justice for Sugna: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक व्यक्ति (शंकर) की उम्रकैद को बरकरार रखते हुए पितृसत्तात्मक मानसिकता और महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा पर मर्माहत करने वाली टिप्पणी की है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने बूंदी (राजस्थान) के ‘शंकर बनाम राज्य’ मामले में फैसला सुनाते हुए समाज की विडंबनाओं पर कड़ा प्रहार किया। कोर्ट ने कहा कि बढ़ती साक्षरता और आर्थिक विकास के बावजूद, घरों के भीतर आज भी पुरुषों का ही वर्चस्व है। कोर्ट ने कहा कि आजादी के आठ दशक बाद भी भारत में पितृसत्ता एक ‘बीमारी’ की तरह व्याप्त है, जहां महिलाओं की स्वायत्तता आज भी पुरुषों की शर्तों पर निर्भर है।

मामला क्या था? (The Tragic Incident)

  • पृष्ठभूमि: अक्टूबर 2012 में शंकर की शादी सुगना बाई से हुई थी। शंकर की शराब की लत और हिंसक व्यवहार से परेशान होकर सुगना अपने मायके चली गई थी।
  • हत्या का कारण: शंकर मायके पहुँचा और तुरंत साथ चलकर खाना बनाने की जिद की। जब सुगना वापस आई और खाना बनाने लगी, तो नशे में धुत शंकर ने उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी और कमरा बाहर से लॉक कर दिया।
  • मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration): सुगना ने अस्पताल में मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया और चार दिन बाद दम तोड़ दिया। इसी बयान को कोर्ट ने सजा का मुख्य आधार माना।

पितृसत्ता पर कोर्ट की “पोस्टमार्टम” टिप्पणी

  • अदालत ने फैसले के अंत में एक विस्तृत ‘पोस्टस्क्रिप्ट’ जोड़कर देश में महिलाओं की स्थिति का विश्लेषण किया।
  • दोहरा बोझ: कोर्ट ने कहा कि शहरी क्षेत्रों में भले ही जेंडर रोल्स बदल रहे हों, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में कामकाजी महिलाओं से भी यही उम्मीद की जाती है कि वे ऑफिस जाने से पहले और लौटने के बाद घर का सारा काम और खाना खुद संभालें।
  • दहेज और हिंसा: कोर्ट ने 2023 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए। जजों ने पूछा कि दशकों के सुधारों के बाद भी महिलाओं के शरीर और पसंद पर नियंत्रण की कोशिशें खत्म क्यों नहीं हो रहीं?
  • जिम्मेदारी: “शायद, इसका उत्तर केवल ‘हम भारत के लोग’ के पास है।”

कानूनी जिरह और ‘Dying Declaration’

  • बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि सुगना का बयान भरोसेमंद नहीं है क्योंकि उसे उसके माता-पिता ने ‘ट्यूटर’ (सिखाया) किया था। कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
  • मेडिकल फिटनेस: डॉक्टर ने प्रमाणित किया था कि सुगना बयान देने की मानसिक स्थिति में थी।
  • पुख्ता सबूत: भले ही कुछ चश्मदीद गवाह मुकर गए हों, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट और जलने के निशान मृत्यु पूर्व बयान की पूरी तरह पुष्टि करते हैं।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयसुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
सजाआरोपी शंकर की उम्रकैद बरकरार।
पितृसत्तायह एक सामाजिक विकृति है जो महिलाओं की समानता के अधिकार को बाधित करती है।
संवैधानिक वादाआजादी के 80 साल बाद भी महिलाओं के लिए ‘समानता’ एक दूर का सपना बनी हुई है।
समाज की सोचमहिलाओं की स्वायत्तता आज भी घरों में पुरुषों द्वारा सीमित की जाती है।

निष्कर्ष: कानून बनाम सामाजिक सोच

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक अपराधी को सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के लिए एक आईना है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ‘पितृसत्ता’ की यह बीमारी जड़ से खत्म नहीं होगी, तब तक कानून और नीतियां महिलाओं को पूर्ण सुरक्षा और समानता प्रदान करने में असमर्थ रहेंगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
haze
37 ° C
37 °
37 °
44 %
2.1kmh
79 %
Sun
45 °
Mon
45 °
Tue
44 °
Wed
42 °
Thu
41 °

Recent Comments