Sunday, August 30, 2026
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Maintenance Ruling: कमाई कम है, यह बहाना नहीं चलेगा…पति से कहा-पैसे नहीं दिए तो नीलाम करेंगे आपकी संपत्ति

Maintenance Ruling: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) के एक मामले में पति की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए एक बेहद कड़ा और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।

पति की याचिका को खारिज कर दिया

इलाहाबाद हाई कोर्ट जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की बेंच ने बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली पति की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने न केवल भरण-पोषण की राशि को बरकरार रखा, बल्कि भुगतान न करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ‘पर्याप्त आय न होना’ पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने से बचने का बहाना नहीं हो सकता।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी (Income vs. Obligation)

  • पति का तर्क था कि उसकी आय इतनी नहीं है कि वह फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि का भुगतान कर सके।
  • कानूनी जिम्मेदारी: “भरण-पोषण का निर्धारण करते समय कोर्ट भुगतान करने वाले व्यक्ति की क्षमता देखता है, लेकिन केवल ‘पर्याप्त आय नहीं है’ कहना वैधानिक जिम्मेदारी (Statutory Obligation) से बचने का आधार नहीं हो सकता।”
  • बुनियादी जरूरतें: पत्नी और बच्चे के भोजन, आवास, चिकित्सा और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए पति को भुगतान करना ही होगा।

संपत्ति की नीलामी का आदेश (Attachment & Auction)

  • अदालत ने इस मामले में एक कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया है।
  • बकाया राशि: यदि पति पिछले बकाया (Arrears) को साफ नहीं करता है और नियमित भुगतान जारी नहीं रखता है, तो उसकी संपत्ति को कुर्क (Attach) कर नीलाम कर दिया जाएगा।
  • ब्याज सहित भुगतान: नीलामी से मिलने वाली राशि को बुलंदशहर फैमिली कोर्ट के खाते में जमा किया जाएगा। इससे 6% प्रति वर्ष के ब्याज के साथ बकाया और भविष्य का नियमित भरण-पोषण दिया जाएगा।

धारा 125 (CrPC): एक ‘आपातकालीन’ सुरक्षा

  • हाई कोर्ट ने धारा 125 (अब BNSS की संबंधित धारा) के उद्देश्य को दोहराया।
  • मकसद: यह प्रावधान पत्नियों, बच्चों और माता-पिता को दर-दर भटकने (Destitution) और भुखमरी से बचाने के लिए एक ‘आपातकालीन उपाय’ के रूप में बनाया गया है।
  • अपवाद: पत्नी को भरण-पोषण तभी नहीं मिलेगा यदि वह व्यभिचार (Adultery) में रह रही हो, बिना किसी पर्याप्त कारण के अलग रह रही हो, या आपसी सहमति से अलग हुई हो। इस केस में कोर्ट ने पाया कि पत्नी को दहेज और क्रूरता के कारण घर छोड़ने पर मजबूर किया गया था।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयविवरण
भरण-पोषण राशिपत्नी के लिए ₹5,000 और नाबालिग बेटी के लिए ₹3,000 प्रतिमाह।
कोर्ट का आदेशफैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और याचिका खारिज की।
सख्त निर्देशभुगतान में देरी होने पर संपत्ति कुर्क कर नीलाम करने का आदेश।
ब्याज दरबकाया राशि पर 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा।

निष्कर्ष: परिवार के प्रति जवाबदेही अनिवार्य

यह फैसला उन पतियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो अपनी आय कम बताकर या बेरोजगार होने का नाटक कर परिवार की जिम्मेदारी से भागना चाहते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर आपके पास अपनी पत्नी और बच्चे को देने के लिए नकद राशि नहीं है, तो कानून आपकी संपत्ति बेचकर उनका हक दिलाएगा।

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