Dowry Law Shield: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act), 1961 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य सवाल | क्या पत्नी के आरोप ही उसके खिलाफ सबूत बन सकते हैं? |
| सुप्रीम कोर्ट का जवाब | बिल्कुल नहीं। धारा 7(3) इसे स्पष्ट रूप से रोकती है। |
| उद्देश्य | ताकि पीड़ित महिलाएं बिना किसी डर के दहेज उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा सकें। |
| नतीजा | मजिस्ट्रेट का FIR दर्ज न करने का फैसला सही था; अपील खारिज। |
पति के अपील को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। पति चाहता था कि उसकी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ ‘दहेज देने’ के अपराध में FIR दर्ज की जाए, क्योंकि पत्नी ने खुद अपनी शिकायत में स्वीकार किया था कि उसने दहेज दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पत्नी अपने पति के खिलाफ दहेज लेने का आरोप लगाती है, तो उस शिकायत के आधार पर खुद पत्नी या उसके परिवार पर ‘दहेज देने’ का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
पति का तर्क: खुद ही तो मान रहे हैं कि दहेज दिया
- दलील: पति ने तर्क दिया कि चूंकि पत्नी ने अपनी FIR (498A और दहेज उत्पीड़न के तहत) में स्वीकार किया है कि उसके परिवार ने दहेज दिया है, इसलिए यह दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 के तहत एक अपराध का ‘इकबालिया बयान’ (Confession) है।
- मांग: पति ने मजिस्ट्रेट से मांग की थी कि पत्नी के इस बयान के आधार पर उसके खिलाफ भी जवाबी FIR दर्ज की जाए।
धारा 7(3): पीड़ित के लिए कानूनी कवच (Immunity Shield)
- सुप्रीम कोर्ट ने पति के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 7(3) का हवाला दिया।
- कानूनी प्रावधान: धारा 7(3) स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी भी कानून में कुछ भी लिखा हो, लेकिन ‘पीड़ित व्यक्ति’ द्वारा अपनी शिकायत में दिया गया बयान, उसे इस अधिनियम के तहत अभियोजन (Prosecution) का पात्र नहीं बनाएगा।
- कोर्ट का निष्कर्ष: चूंकि पत्नी और उसका परिवार ‘पीड़ित’ (Aggrieved persons) हैं, इसलिए उनकी शिकायतों या बयानों को उनके ही खिलाफ ‘दहेज देने’ के सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कब दर्ज हो सकती है दहेज देने की FIR?
- अदालत ने एक बहुत ही बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है।
- केवल बयान के आधार पर: यदि पुलिस के पास ‘दहेज देने’ का एकमात्र सबूत पत्नी की अपनी शिकायत या बयान (धारा 161 के तहत) है, तो कोई कार्रवाई नहीं होगी। उन्हें धारा 7(3) का संरक्षण मिलेगा।
- स्वतंत्र साक्ष्य होने पर: यदि किसी मामले में ‘दहेज देने’ के स्वतंत्र सबूत (Independent Evidence) मौजूद हैं, जो पत्नी की शिकायत पर आधारित नहीं हैं, तो ‘दहेज देने’ के अपराध में FIR दर्ज की जा सकती है। उस स्थिति में धारा 7(3) का कवच काम नहीं करेगा।
न्यायपालिका का संतुलित दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन पतियों के लिए एक झटका है जो अपनी पत्नियों को चुप कराने के लिए ‘काउंटर-केस’ की धमकी देते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि कानून का मकसद पीड़ितों को सुरक्षा देना है, न कि उन्हें अपनी ही शिकायत के जाल में फंसाना। यह निर्णय ‘दहेज देने’ और ‘दहेज के लिए मजबूर होने’ के बीच के मानवीय अंतर को भी सम्मान देता है।
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
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