Fake Claim: छत्तीसगढ़ में अदालतों के जरिए फर्जी मुआवजा (Compensation Claims) ऐंठने वाले बड़े सिंडिकेट और इसमें वकीलों की मिलीभगत पर हाई कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
फर्जी क्लेम (दावा) याचिका दायर करने का आरोप
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने फर्जी क्लेम (दावा) याचिका दायर करने के आरोप में एफआईआर (FIR) का सामना कर रहे दो युवा वकीलों की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की। इसके साथ ही कोर्ट ने पूरे छत्तीसगढ़ की निचली अदालतों में चल रहे ऐसे फर्जी मामलों की जांच के लिए एक राज्यव्यापी अभियान चलाने का आदेश दे दिया है। कोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि कानून के रक्षकों को ही इस तरह के फर्जीवाड़े में शामिल देखना बेहद दर्दनाक है। यह न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया का मजाक है, बल्कि इससे न्याय प्रणाली पर आम जनता का भरोसा भी टूटता है।
नोबल प्रोफेशन पर दाग लगा रहे हैं कुछ वकील: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने वकीलों की अनैतिक गतिविधियों पर कड़ा प्रहार करते हुए 14 मई को अपने आदेश में कहा, यह देखना बेहद पीड़ादायक है कि एडवोकेट्स इस तरह की अनैतिक और अवैध गतिविधियों में शामिल होकर वकालत के पेशे की गरिमा, पवित्रता और कुलीनता को कलंकित कर रहे हैं। यह नोबल प्रोफेशन पूरी तरह से निष्पक्षता, सच्चाई और न्याय व्यवस्था पर टिका हुआ है। फर्जी क्लेम केस दाखिल करना न्याय का गला घोंटने जैसा है।
क्या था पूरा मामला? (कैसे खुली वकीलों की पोल?)
यह मामला दो जूनियर वकीलों वैभव सिंह और शुभम चंद्रवंशी की अग्रिम जमानत याचिकाओं से जुड़ा था। दोनों बिलासपुर के एक सीनियर एडवोकेट एन. पी. चंद्रवंशी के अधीन काम कर रहे थे।
अदालत के आदेश पर FIR: एक निचली अदालत में एक कथित रूप से फर्जी और मनगढ़ंत क्लेम (मुआवजा) याचिका दायर की गई थी। जब अदालत ने इसकी आंतरिक जांच कराई, तो मामला पूरी तरह फर्जी निकला। इसके बाद अदालत के निर्देश पर पुलिस ने सीनियर एडवोकेट, इन दोनों जूनियर वकीलों और एक अन्य व्यक्ति (भगवती कश्यप) के खिलाफ जालसाजी की एफआईआर दर्ज की।
पूरे राज्य में फैला है जाल: सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों ने खुद कोर्ट के सामने यह चौंकाने वाली बात कबूली कि ऐसा फर्जीवाड़ा सिर्फ एक कोर्ट में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के कई जिलों में धड़ल्ले से चल रहा है, जहां एक्सीडेंट या अन्य क्लेम के फर्जी केस बनाकर बीमा कंपनियों और सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है।
बिलासपुर SSP को कड़ा निर्देश और सुप्रीम कोर्ट का कनेक्शन
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने इस जांच को किसी छोटे अधिकारी के भरोसे छोड़ने के बजाय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), बिलासपुर को व्यक्तिगत रूप से इस जांच की निगरानी (Personal Monitoring) करने का आदेश दिया है ताकि सिंडिकेट की तह तक पहुंचा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट भी है सख्त
हाई कोर्ट ने नोट किया कि यह बीमारी सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट पहले से ही ‘सफीक अहमद बनाम आईसीआईसीआई लोम्बार्ड’ केस में मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) और वर्कमैन कंपनसेशन क्लेम में होने वाले ऐसे ही फर्जीवाड़ों की मॉनिटरिंग कर रहा है और इस पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से जवाब भी मांगा है।
हाई कोर्ट का ‘बड़ा हंटर’: पूरे राज्य के लिए जारी हुआ आदेश
हाई कोर्ट ने इस मामले को सिर्फ दो वकीलों की जमानत तक सीमित न रखते हुए पूरे राज्य के लिए एक सख्त मैकेनिज्म (Reporting Mechanism) तैयार कर दिया है।
सभी जिला जजों को आदेश: छत्तीसगढ़ के सभी प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जजों (जिला न्यायाधीशों) को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने जिलों की अदालतों में चल रहे किसी भी संदिग्ध या फर्जी क्लेम केस की तुरंत पहचान करें।
सीधे सुप्रीम कोर्ट जाएगी रिपोर्ट: जिला जज ऐसी किसी भी गड़बड़ी की रिपोर्ट तुरंत हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजेंगे, जो इस पूरी रिपोर्ट को आगे की कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश करेंगे।
जूनियर वकीलों को अंतरिम राहत: हालांकि, कोर्ट ने माना कि विवादित क्लेम याचिका के हलफनामे (Affidavit) पर सीनियर एडवोकेट चंद्रवंशी के दस्तखत थे, इसलिए जूनियर वकीलों की भूमिका की जांच जारी रहने तक उनकी अंतरिम सुरक्षा (Ad-interim Protection) को बरकरार रखा गया है। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई 2026 को होगी।
विश्लेषण: क्लेम सिंडिकेट पर इस फैसले का क्या असर होगा?
| इम्पैक्ट एरिया | हाई कोर्ट का एक्शन और इसके मायने |
| फर्जी क्लेम सिंडिकेट का खात्मा | एक्सीडेंट के फर्जी दस्तावेज, फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट और फर्जी गवाह तैयार करके बीमा कंपनियों से करोड़ों ऐंठने वाले गिरोहों (जिसमें कुछ वकील और पुलिसकर्मी भी शामिल होते हैं) पर अब गाज गिरना तय है। |
| वकीलों के लिए कड़ा सबक | बार काउंसिल और अदालतों का रुख साफ है— ‘काला कोट’ पहनने का मतलब यह नहीं है कि आपको अपराध करने का लाइसेंस मिल गया है। फर्जीवाड़े में नाम आने पर वकीलों का लाइसेंस तक रद्द हो सकता है। |
| सिस्टम की सफाई | सभी जिलों से रिपोर्ट तलब होने के कारण अब निचली अदालतों के जजों को भी क्लेम याचिकाओं को पास करने से पहले दस्तावेजों की बारीकी से स्क्रूटनी (Scrutiny) करनी होगी। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह आदेश न्यायिक व्यवस्था की साख बचाने के लिए एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसा है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्याय के मंदिर को ‘उगाही का अड्डा’ और वकालत की डिग्री को ‘जालसाजी का हथियार’ बनाने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती, चाहे आरोपी कितना भी रसूखदार वकील क्यों न हो।

