Friday, October 30, 2026
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Tribunal Order: माता-पिता के तलाक के बाद भी बच्चों को मिलेगी फैमिली पेंशन…क्यूं कहा पिता की मर्जी से नहीं छीन सकता बच्चों का हक, पढ़िए मामला

Tribunal Order: क्या माता-पिता का तलाक होने या पिता द्वारा जायदाद से बेदखल कर दिए जाने के बाद बच्चों का ‘फैमिली पेंशन’ (Family Pension) पर हक खत्म हो जाता है?

बेटे और बेटी को बराबर हिस्से में ब्याज सहित फैमिली पेंशन दें

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) की लखनऊ बेंच ने इस अहम सवाल पर एक बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने साफ किया है कि माता-पिता के तलाक से बच्चों के स्टेटस पर कोई फर्क नहीं पड़ता और कोई भी कर्मचारी अपनी मर्जी से अपने बच्चों का पेंशन हक नहीं छीन सकता। ट्रिब्यूनल के प्रशासनिक सदस्य पंकज कुमार ने रेलवे अधिकारी के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसके तहत एक दिवंगत रेल कर्मी के बच्चों को फैमिली पेंशन देने से मना कर दिया गया था। ट्रिब्यूनल ने दिवंगत कर्मचारी की तलाकशुदा पत्नी को तो पेंशन देने से इनकार कर दिया, लेकिन उनके बेटे और बेटी को बराबर हिस्से में ब्याज सहित फैमिली पेंशन देने का आदेश जारी किया है।

ट्रिब्यूनल का रुख: तलाक से मां का रिश्ता टूटा, बच्चों का नहीं

ट्रिब्यूनल ने रेलवे पेंशन नियमों और बच्चों के अधिकारों के बीच की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए 25 मई को अपने आदेश में कहा, दिवंगत रेल कर्मचारी के बच्चों के रूप में उनका दर्जा (Status) इस बात से प्रभावित नहीं होता कि उनकी मां का तलाक हो चुका है। इसलिए, वे पेंशन रूल्स के नियम 75 के तहत फैमिली पेंशन के पूरी तरह हकदार हैं। पेंशन का अधिकार कानून (अनुच्छेद 309) द्वारा बनाया गया है। इसे किसी कर्मचारी द्वारा दिए गए या न दिए गए किसी हलफनामे (Declaration) के आधार पर बदला या छीना नहीं जा सकता।

क्या था पूरा मामला? (पिता ने कागजों में किया था बेदखल)

यह मामला रेलवे के एक सेवानिवृत्त टेक्नीशियन ग्रेड-I से जुड़ा है, जो जुलाई 2016 में रिटायर हुए थे और 23 नवंबर 2019 को उनका निधन हो गया था।

जायदाद से बेदखल और तलाक: दिवंगत कर्मचारी ने जीते जी साल 2009 में एक हलफनामा दिया था कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को अपनी सभी चल-अचल संपत्ति से बेदखल करते हैं। इसके बाद 1 अगस्त 2016 को लखनऊ की फैमिली कोर्ट से उनका पत्नी के साथ एकतरफा (Ex-parte) तलाक भी हो गया।

पेंशन फॉर्म में किसी को नहीं बनाया नॉमिनी: रिटायरमेंट के बाद नवंबर 2016 में उन्होंने रेलवे को लिखकर दिया कि वे फैमिली पेंशन के लिए अपने परिवार के किसी भी सदस्य को नॉमिनी (Nominate) नहीं बनाना चाहते। नतीजतन, उनके पेंशन ऑर्डर (PPO) में परिवार के किसी सदस्य का नाम नहीं था।

रेलवे ने खारिज किया था दावा: कर्मचारी की मौत के बाद, साल 2022 में अलग रह रही पत्नी और बच्चों ने फैमिली पेंशन के लिए दावा किया। लेकिन रेलवे ने अक्टूबर 2022 में यह कहते हुए उनका दावा खारिज कर दिया कि दिवंगत कर्मचारी ने खुद अपने परिवार को बेदखल किया था और उनका तलाक भी हो चुका था। इसके बाद पीड़ित परिवार ने ट्रिब्यूनल (CAT) का रुख किया।

कानूनी पेचीदगी: क्या कहता है रेलवे पेंशन का नियम 75?

ट्रिब्यूनल ने ‘फैमिली पेंशन स्कीम फॉर रेलवे सर्वेंट्स रूल्स, 1964’ के नियम 75 की व्याख्या करते हुए स्थिति साफ की।

पत्नी का दावा खारिज क्यों?: नियम के मुताबिक, फैमिली पेंशन केवल विधवा (पुनर्विवाह तक) को मिल सकती है। चूंकि कर्मचारी की मौत (2019) के समय महिला का कानूनी रूप से तलाक (2016) हो चुका था, इसलिए वह तकनीकी तौर पर ‘विधवा’ की श्रेणी में नहीं आती।

बच्चों का दावा मंजूर क्यों?: नियम के तहत दिवंगत कर्मचारी के अविवाहित बच्चे 25 वर्ष की आयु तक, या शादी होने तक, या आजीविका कमाने तक (जो भी पहले हो) पेंशन के हकदार हैं। पिता का रेलवे को यह लिख कर देना कि “मैं बच्चों को नामजद नहीं करना चाहता”, कानूनन मान्य नहीं है क्योंकि पेंशन कोई खैरात या इनाम (Bounty) नहीं है, बल्कि एक वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है जो कानून ने बच्चों को दिया है।

ट्रिब्यूनल का आदेश: कैट ने रेलवे के खारिज करने वाले आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर बेटे और बेटी को देय तिथि से बराबर किश्तों में ब्याज के साथ फैमिली पेंशन का भुगतान शुरू किया जाए।

विश्लेषण: सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए इस फैसले के मायने

इम्पैक्ट एरियाट्रिब्यूनल का स्टैंड और सामाजिक असर
बच्चों के अधिकारों की सुरक्षामाता-पिता के आपसी झगड़ों या वैवाहिक विवादों की गाज अब बच्चों के वित्तीय भविष्य पर नहीं गिरेगी। पिता चाहकर भी बच्चों को सरकारी पेंशन के हक से वंचित नहीं कर सकता।
सरकारी विभागों को नसीहतरेलवे या किसी भी सरकारी विभाग के लिए यह कड़ा संदेश है कि वे केवल कर्मचारी के ‘नॉमिनेशन फॉर्म’ या हलफनामे को न देखें, बल्कि पेंशन के मूल कानूनी नियमों और वारिसों की पात्रता को प्राथमिकता दें।
तलाकशुदा पत्नी की स्थिति पर स्पष्टताफैसला साफ करता है कि अगर पति की मौत के वक्त तलाक कानूनी रूप से प्रभावी था, तो पत्नी को फैमिली पेंशन नहीं मिल सकती, भले ही वह कितनी भी आर्थिक तंगी में क्यों न हो।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल का यह फैसला एक बेहतरीन कानूनी नजीर है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि पारिवारिक रिश्ते और शादियां टूट सकती हैं, लेकिन बच्चों के प्रति माता-पिता की कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं। सरकारी नियम बच्चों को सुरक्षा देने के लिए बने हैं, और उन्हें किसी व्यक्ति के गुस्से या निजी फैसले की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।

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