Wednesday, October 28, 2026
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Lawyer’s License Row: क्या हमें ऐसे वकीलों की जरूरत है जो उम्र छुपाकर नामांकन कराएं?…20 साल बाद लाइसेंस निलंबन पर यह रहा सुप्रीम निर्देश

Lawyer’s License Row: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे वकील को राहत देने से साफ इनकार कर दिया, जिसने अपनी वकालत की शुरुआत में ही आयु (Age) को लेकर कथित तौर पर धोखाधड़ी की थी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पंजाब और हरियाणा के एक वकील की याचिका पर सुनवाई की, जिनका लाइसेंस नामांकन के दो दशक बाद रद्द कर दिया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2006 में नामांकन के समय अपनी उम्र कम बताई थी ताकि 45 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा का उल्लंघन न हो। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे लोग कानूनी पेशे की गरिमा के लिए सही नहीं हैं।

दस्तावेजों में असंभव गणित (The Mathematical Impossibility)

  • सुप्रीम कोर्ट ने वकील के दस्तावेजों में मौजूद विसंगतियों को पकड़ते हुए तीखे सवाल पूछे।
  • बच्चों की उम्र: वकील के दस्तावेजों के अनुसार, यदि उनकी घोषित आयु को सही मान लिया जाए, तो जब उनके बच्चे पैदा हुए तब उनकी उम्र महज 12 साल रही होगी।
  • दो महीनों का अंतर: उनके दो बच्चे, जो खुद भी वकील हैं, के जन्म के बीच केवल दो महीने का अंतर दर्ज था।
  • कोर्ट की टिप्पणी: “क्या आपके पास दो पत्नियां हैं? केवल तभी 2 महीने के अंतर पर दो बच्चे हो सकते हैं। सब कुछ गलत है। क्या वे किसी भी तरह की राहत के हकदार हैं?”

बार की राजनीति का तर्क विफल

  • वकील के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल 20 साल से वकालत कर रहे हैं और बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई ‘बार की आंतरिक राजनीति’ का परिणाम है।
  • अदालत का जवाब: “एक इंसान को पता होना चाहिए कि राजनीति कब छोड़नी है। वह घर बैठकर परामर्श (Consultation) दे सकते हैं, लेकिन कानूनी सलाहकार (Legal Consultant) के रूप में नहीं।”

कानूनी पेंच: निलंबन का अधिकार (Authority of the Committee)

  • वकील ने तर्क दिया था कि राज्य बार काउंसिल की नामांकन समिति (Enrolment Committee) के पास लाइसेंस निलंबित करने का अंतिम अधिकार नहीं है।
  • हाई कोर्ट का रुख: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पहले कहा था कि भले ही समिति नाम स्थायी रूप से नहीं हटा सकती, लेकिन वह अंतरिम निलंबन की सिफारिश कर सकती है।
  • सुप्रीम कोर्ट का रुख: कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि उपयुक्त मामलों में अदालतें बार काउंसिल की भूमिका निभा सकती हैं।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
नामांकन वर्ष2006 (वकालत का अनुभव लगभग 20 साल)।
मुख्य आरोप45 वर्ष की आयु सीमा पार करने के बाद फर्जी दस्तावेजों से नामांकन।
अन्य फर्जीवाड़ा10+2 का सर्टिफिकेट एक गैर-मान्यता प्राप्त बोर्ड से पाया गया।
सुप्रीम कोर्ट का आदेशयाचिका वापस लेने की अनुमति; बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को 4 महीने में फैसला लेने का निर्देश।

कानूनी पेशे की शुचिता (Sanctity of the Profession)

सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख यह संदेश देता है कि वकालत का पेशा केवल ‘प्रैक्टिस’ के वर्षों से महान नहीं बनता, बल्कि उसकी नींव सत्यनिष्ठा (Integrity) पर आधारित होनी चाहिए। यदि शुरुआत ही झूठ और फर्जी दस्तावेजों से हुई है, तो 20 साल का अनुभव भी उस गलती को वैध नहीं बना सकता।

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