Legal Discipline: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वकीलों के कोर्ट में पेश न होने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई है।
जस्टिस कृष्ण पहल की बेंच ने एक POCSO मामले में जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वकीलों की बार-बार अनुपस्थिति न केवल ‘पेशेवर कदाचार’ (Professional Misconduct) है, बल्कि यह ‘बेंच हंटिंग’ (Bench Hunting) या ‘फोरम शॉपिंग’ के समान है। यह मामला फरवरी 2025 में दायर एक जमानत याचिका से जुड़ा था। कोर्ट ने पाया कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच कई तारीखें पड़ने के बावजूद याचिकाकर्ता के वकील एक बार भी बहस के लिए पेश नहीं हुए।
‘बेंच हंटिंग’ और ‘फोरम शॉपिंग’ क्या है?
- अदालत ने वकीलों की अनुपस्थिति के पीछे एक संभावित रणनीति की ओर इशारा किया।
- बेंच हंटिंग (Bench Hunting): इसका मतलब है कि वकील जानबूझकर तब तक तारीखें बढ़वाते हैं या अनुपस्थित रहते हैं, जब तक कि मामला उनकी ‘पसंद’ के जज या बेंच के सामने न आ जाए।
- प्रोफेशनल मिसकंडक्ट: कोर्ट ने कहा कि बार-बार बिना किसी उचित कारण के कोर्ट से नदारद रहना वकीलों के पेशेवर नैतिक मूल्यों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपनी सख्ती को सही ठहराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दो बड़े फैसलों का जिक्र किया।
- ईश्वरलाल माली राठौड़ बनाम गोपाल: सुप्रीम कोर्ट ने इसमें साफ कहा था कि अदालतों को रूटीन तरीके से स्थगन (Adjournment) नहीं देना चाहिए। अदालतों को ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए समयबद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।
- लक्ष्य तवर बनाम CBI: इस हालिया फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) से जुड़े मामलों में हाई कोर्ट्स को बार-बार तारीखें देकर केस लंबित नहीं रखने चाहिए।
“न्यायिक संसाधनों की बर्बादी” पर चिंता
- जस्टिस पहल ने सीमित न्यायिक संसाधनों के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाया।
- समय की कीमत: कोर्ट पहले से ही भारी बोझ तले दबा है। वकीलों की लापरवाही से वह कीमती समय बर्बाद होता है जो गंभीर मामलों की सुनवाई में लगना चाहिए।
- मुआवजे की चेतावनी: कोर्ट ने कहा कि जो पक्ष जानबूझकर न्यायिक समय बर्बाद करते हैं, उन्हें न केवल विपक्षी पार्टी को बल्कि न्यायिक प्रणाली को भी हर्जाना देना चाहिए।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मामला | POCSO एक्ट के तहत जमानत याचिका। |
| तारीखें | नवंबर 2025, जनवरी, मार्च और अप्रैल 2026 में वकील अनुपस्थित रहे। |
| कोर्ट का निष्कर्ष | याचिकाकर्ता ने केस में रुचि खो दी है, इसलिए याचिका ‘निष्प्रभावी’ (Infructuous) हो गई। |
| मुख्य टिप्पणी | “लंबित होने के बहाने” (Cloak of Pendency) केस को अनिश्चितकाल के लिए लटकाया नहीं जा सकता। |
वकीलों और वादियों के लिए एक कड़ा संदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो अदालती कार्यवाही को केवल एक ‘प्रतीक्षा खेल’ (Waiting Game) समझते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जमानत की अर्जी लंबित होने मात्र से आरोपी को कोई विशेष अधिकार नहीं मिल जाता। न्याय की धारा को बार-बार अनुपस्थित रहकर “धुंधला” (Dilute) करना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।

