Wednesday, June 17, 2026
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Void Appointment: नियम तोड़कर पाई गई नौकरी अब नहीं चलेगी…नाबालिग की सरकारी नौकरी पर देखिए क्या है कानूनी सिद्धांत, पढ़ें

Void Appointment: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है।

कोर्ट ने कहा कि किसी नाबालिग (Minor) की सरकारी या सार्वजनिक पद पर नियुक्ति ‘शून्य’ (Void Ab Initio) होती है, यानी वह कानून की नज़र में शुरू से ही अवैध है और उससे कोई भी कानूनी अधिकार (जैसे वेतन या पद) पैदा नहीं हो सकता। यह मामला उत्तर प्रदेश के एक जूनियर हाई स्कूल में गैर-शिक्षण कर्मचारियों (Non-teaching staff) की नियुक्ति से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने शिक्षा निदेशक (बेसिक) के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उनके वेतन और नियुक्ति की मान्यता के दावे को खारिज कर दिया गया था।

कोर्ट का मुख्य कानूनी सिद्धांत (Void Ab Initio)

  • अदालत ने ‘शून्य’ नियुक्ति की व्याख्या करते हुए निम्नलिखित बातें कहीं।
  • कानूनी मान्यता का अभाव: किसी नाबालिग की सार्वजनिक पद पर नियुक्ति कानून की नज़र में ‘Non-est’ (अस्तित्वहीन) है। ऐसी नियुक्ति शुरू से ही अवैध होती है और इसे कभी भी वैध नहीं माना जा सकता।
  • अधिकारों का सृजन नहीं: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो कार्य शुरुआत से ही ‘शून्य’ (Void ab initio) है, उससे न तो कोई ‘कानूनी अधिकार’ (Legal Right) पैदा हो सकता है और न ही ‘न्यायसंगत अधिकार’ (Equitable Right)।

केस का बैकग्राउंड और गड़बड़ियां

  • याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे दशकों से स्कूल में काम कर रहे हैं और उनकी नियुक्ति को सक्षम प्राधिकारी ने मंजूरी दी थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
  • नाबालिग की नियुक्ति: रिकॉर्ड से पता चला कि याचिकाकर्ता नंबर 2 की कथित नियुक्ति के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से कम थी।
  • तथ्यों में विरोधाभास: कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने नियुक्ति की तारीख को लेकर अलग-अलग समय पर विरोधाभासी बयान दिए थे।
  • नियमों का उल्लंघन: नियुक्ति के लिए आवश्यक ‘उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल नियम, 1984’ का पालन नहीं किया गया था। न तो कोई विज्ञापन निकाला गया, न चयन समिति बनी और न ही वित्तीय मंजूरी ली गई थी।

इक्विटेबल ज्यूरिसडिक्शन (न्यायसंगत अधिकार क्षेत्र)

  • कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के आचरण पर भी कड़ी टिप्पणी की।
  • तथ्यों को छुपाना: कोर्ट ने कहा कि जब कोई वादी महत्वपूर्ण तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है या जानकारी छुपाता है, तो वह कोर्ट से किसी भी तरह की राहत (Equitable relief) पाने का हकदार नहीं रह जाता।
  • जाली दस्तावेज: कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर भी संदेह जताया और उन्हें “हेरफेर किए हुए” (Manipulated) माना।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मामलाजूनियर हाई स्कूल में अवैध नियुक्ति और वेतन का दावा।
अदालतइलाहाबाद हाई कोर्ट (जस्टिस मंजू रानी चौहान)।
मुख्य कानूनी आधारराम आशीष चौधरी (2003) का डिवीजन बेंच फैसला।
संवैधानिक मर्यादासार्वजनिक धन (Exchequer) से वेतन केवल वैध नियुक्ति पर ही दिया जा सकता है।
परिणामयाचिका खारिज; कोई राहत या वेतन देने से इनकार।

पारदर्शिता और योग्यता ही एकमात्र रास्ता

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियां केवल ‘कानून की प्रक्रिया’ और ‘न्यूनतम पात्रता’ (जैसे सही उम्र और योग्यता) के आधार पर ही होनी चाहिए। यह उन लोगों के लिए कड़ा संदेश है जो पिछले दरवाजे से या नियमों को ताक पर रखकर नौकरी पाने की कोशिश करते हैं और बाद में “लंबे समय से काम करने” की दुहाई देकर उसे नियमित कराना चाहते हैं।

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