Death Penalty Reform: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की बेंच ने मृत्युदंड (Death Penalty) के मामलों में एक ऐतिहासिक और सुधारात्मक फैसला सुनाया है।
अदालत ने चिंता जताई कि फांसी की सजा पाने वाले कैदियों के चरित्र और उनकी पृष्ठभूमि (Mitigation) से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी अक्सर ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के स्तर पर नजरअंदाज कर दी जाती है। यह मामला बिहार के दो कैदियों अमन सिंह और सोनल सिंह की अपील पर सुनवाई के दौरान आया। पटना हाई कोर्ट ने 22 जनवरी, 2026 को उनकी फांसी की सजा बरकरार रखी थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्थगित (Stay) कर दिया है।
विचित्र स्थिति (Piquant Situation) पर कोर्ट की चिंता
- सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि एक “परेशान करने वाला ट्रेंड” बन गया है।
- देरी से जांच: अपराधी के सुधरने की संभावना (Reformation Potential) और उसकी मानसिक स्थिति की रिपोर्ट पहली बार सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर मांगी जाती है।
- समय की बर्बादी: ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा इस डेटा को न जुटाने के कारण सूचना के संग्रह में लंबा अंतराल और अनावश्यक देरी होती है।
- अधूरा रिकॉर्ड: निचली अदालतें केवल “अस्पष्ट विचारों” के आधार पर फैसला सुना देती हैं, जबकि कानूनन उन्हें विस्तृत सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट देखनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के नए अनिवार्य निर्देश (Mandatory Directions)
- अदालत ने मौत की सजा की प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से अधिक मानवीय बनाने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए हैं।
- ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी: दोषी करार दिए जाने के बाद और सजा सुनाने से पहले, ट्रायल कोर्ट को ‘स्वयं’ (Suo Motu) अपराधी की परिस्थितियों (Mitigating Circumstances) पर रिपोर्ट मांगनी होगी।
- हाई कोर्ट के लिए निर्देश: यदि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड में ऐसी रिपोर्ट नहीं है, तो हाई कोर्ट को ‘डेथ रेफरेंस’ (Death Reference) स्वीकार करते समय अनिवार्य रूप से यह रिपोर्ट मंगवानी होगी।
- NALSA की भूमिका: राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) को सामाजिक विज्ञान विशेषज्ञों के लिए गाइडलाइंस बनानी होंगी, जो फील्डवर्क करके कैदी के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का डेटा जुटाएंगे।
स्पेशलाइज्ड लीगल एड (Specialised Legal Teams)
- अदालत ने माना कि मृत्युदंड के मामलों में वकील की गुणवत्ता बहुत मायने रखती है।
- 3 वकीलों की टीम: प्रत्येक मृत्युदंड मामले के लिए कानूनी सेवा समितियों को तीन अधिवक्ताओं की एक समर्पित टीम नियुक्त करनी होगी।
- फील्डवर्क: यह टीम केवल कागजी कार्रवाई नहीं करेगी, बल्कि कैदी के परिवार से बातचीत करेगी और उसकी पृष्ठभूमि, पिछली आदतों और मनोवैज्ञानिक स्थिति का एक समग्र (Holistic) लेखा-जोखा पेश करेगी।
- संसाधनों की उपलब्धता: भले ही कैदी ने निजी वकील रखा हो, कोर्ट उसे कुशल और पर्याप्त संसाधनों से लैस कानूनी सहायता प्रदान करना सुनिश्चित करेगा।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मामला | अमन सिंह और सोनल सिंह बनाम बिहार राज्य। |
| सुधारवादी दृष्टिकोण | सजा केवल अपराध पर नहीं, अपराधी की सुधार क्षमता पर भी आधारित होनी चाहिए। |
| जांच का दायरा | मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन (Psychological Evaluation) और परिवीक्षा रिपोर्ट (Probation Reports)। |
| बेंच का संदेश | जीवन और मृत्यु का निर्णय ‘अस्पष्ट’ नहीं, बल्कि ‘ठोस’ डेटा पर आधारित होना चाहिए। |
दुर्लभतम से दुर्लभ (Rarest of Rare) की नई परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि “दुर्लभतम से दुर्लभ” मामले में फांसी की सजा तभी दी जाए जब यह वैज्ञानिक और सामाजिक रूप से सिद्ध हो जाए कि अपराधी के सुधरने की कोई भी गुंजाइश नहीं बची है। यह न्यायिक प्रणाली को केवल ‘दंडात्मक’ (Punitive) से ‘सुधारात्मक’ (Reformative) बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

