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Hate Speech: नए कानून बनाना संसद का काम, कोर्ट का नहीं…हेट स्पीच पर बोले-BNSS है न… फिर नए कानूनों की क्या जरूरत?

Hate Speech: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने हेट स्पीच (नफरती भाषण) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
बेंचजस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता।
फैसले का आधारशक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत (Separation of Powers)।
कानूनी स्थितिहेट स्पीच के लिए मौजूदा कानून (IPC/BNSS) पर्याप्त माने गए।
सुझावसरकार लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट पर विचार कर सकती है।
मुख्य संदेशकोर्ट कानून लागू करा सकता है, लेकिन नया कानून ‘बना’ नहीं सकता।

नफरती भाषणों से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त

अदालत ने स्पष्ट किया कि नफरती भाषणों से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त हैं और नए कानून बनाना या नई सजा तय करना संसद (Parliament) का काम है, न कि न्यायपालिका का। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले और ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत पर अहम बातें सामने आई। अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें हेट स्पीच को रोकने के लिए कोर्ट से नए दिशा-निर्देशों की मांग की गई थी।

कोर्ट का मुख्य कानूनी तर्क (Domain of Parliament)

  • अदालत ने ‘संविधान’ और ‘विधायिका’ की मर्यादा को रेखांकित किया।
  • न्यायिक सीमा: “अपराधों को परिभाषित करना और उनके लिए सजा तय करना पूरी तरह से विधायी क्षेत्र (Legislative Domain) में आता है। शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत न्यायपालिका को नए अपराध बनाने या न्यायिक निर्देशों के माध्यम से आपराधिक दायित्व का विस्तार करने की अनुमति नहीं देता।”
  • कानून खाली नहीं है: कोर्ट ने उन दलीलों को गलत बताया जिनमें कहा गया था कि हेट स्पीच पर कानून की कमी है। बेंच ने कहा कि IPC (अब नए कानूनों के तहत प्रावधान) और अन्य कानून धार्मिक भावनाओं को आहत करने या शत्रुता को बढ़ावा देने वाले कृत्यों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं।

भाईचारे (Fraternity) और संविधान पर असर

  • भले ही कोर्ट ने नए निर्देश नहीं दिए, लेकिन हेट स्पीच की गंभीरता पर कड़ी टिप्पणी की।
  • संवैधानिक आदेश: कोर्ट ने माना कि हेट स्पीच और अफवाह फैलाना सीधे तौर पर देश के भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण को प्रभावित करते हैं।
  • लॉ कमीशन का सुझाव: बेंच ने केंद्र और राज्यों को सुझाव दिया कि वे अपनी बुद्धिमत्ता से तय करें कि क्या विधि आयोग (Law Commission) की 267वीं रिपोर्ट (2017) के आधार पर कानून में बदलाव की आवश्यकता है।

BNSS और मजिस्ट्रेट की शक्तियां

  • अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की भूमिका पर जोर दिया:
  • व्यापक तंत्र: कोर्ट ने कहा कि BNSS नफरती भाषण के खिलाफ आपराधिक कानून को गति में लाने के लिए एक व्यापक तंत्र (Comprehensive Mechanism) प्रदान करता है।
  • मजिस्ट्रेट की निगरानी: मजिस्ट्रेट के पास इन मामलों में ‘सुपरवाइजरी पावर’ होती है, जिसका उपयोग प्रभावी रूप से किया जा सकता है।

कानून का राज और न्यायिक संयम

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला “न्यायिक सक्रियता” (Judicial Activism) के बजाय “न्यायिक संयम” (Judicial Restraint) का उदाहरण है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि समाज की बदलती चुनौतियों के अनुसार कानून बनाना जनप्रतिनिधियों (सांसदों) का काम है। जनता की सुरक्षा के लिए तंत्र मौजूद है, बस उसे सही तरीके से लागू करने की जरूरत है।

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