Public Law vs. Private Contract: दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने सरकारी नौकरी में छंटनी के मामले मंे एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | जिवेश कुमार तिवारी (मैनेजर, फाइनेंस)। |
| नियोक्ता | EESL (बिजली मंत्रालय के तहत सार्वजनिक उपक्रमों का संयुक्त उद्यम)। |
| कोर्ट का आदेश | 6 दिसंबर 2019 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द किया और पुनर्बहाली (Reinstatement) का आदेश दिया। |
| अधिकार | कंपनी कानून के अनुसार नई अनुशासनात्मक जांच शुरू करने के लिए स्वतंत्र है। |
कार्रवाई अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा उतरना जरूरी: कोर्ट
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) किसी नियमित कर्मचारी को सेवा से निकालता है, तो वह केवल एक निजी अनुबंध (Private Contract) का मामला नहीं रह जाता। ऐसी कार्रवाई को अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा उतरना होगा, जिसमें निष्पक्षता और मनमानी का अभाव अनिवार्य है। यह मामला ‘एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज लिमिटेड’ (EESL) के एक मैनेजर (फाइनेंस) जिवेश कुमार तिवारी की बर्खास्तगी से जुड़ा था। उन्हें “काम छोड़ने के अनुमान” (Deemed Abandonment) के आधार पर नौकरी से निकाल दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि: ट्रांसफर और विवाद
- आरोप: याचिकाकर्ता (चार्टर्ड अकाउंटेंट) ने संगठन के भीतर वित्तीय अनियमितताओं की रिपोर्ट की थी, जिसके बाद उनका तबादला नोएडा से अगरतला, त्रिपुरा कर दिया गया।
- विवाद: उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से इस तबादले का विरोध किया और वहां जॉइन नहीं किया।
- कार्रवाई: कंपनी ने 90 दिनों की अनुपस्थिति के बाद सर्विस रूल्स के एक क्लॉज का हवाला देते हुए 6 दिसंबर 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।
कोर्ट का मुख्य कानूनी सिद्धांत: अनुच्छेद 14 की शक्ति
- अदालत ने नियोक्ता (Employer) के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह केवल एक निजी सेवा अनुबंध का मामला है।
- निजी अनुबंध से ऊपर: “जहां नियोक्ता सार्वजनिक कानून के अनुशासन के अधीन है और कार्रवाई सेवा नियमों के तहत की गई है, वहां मामला निजी अनुबंध के दायरे से बाहर निकल जाता है।”
- संवैधानिक मानक: कोर्ट ने कहा कि भले ही नौकरी की शुरुआत एक कॉन्ट्रैक्ट से हुई हो, लेकिन एक नियमित कर्मचारी को हटाते समय Fairness (निष्पक्षता) और Non-arbitrariness (गैर-मनमानी) का पालन करना अनिवार्य है।
Deemed Abandonment पर कोर्ट का रुख
- अदालत ने ‘काम छोड़ देने’ की धारणा को यांत्रिक (Mechanical) तरीके से लागू करने की आलोचना की।
- इरादा (Intention) जरूरी: कोर्ट ने कहा कि केवल समय बीत जाने या अनुपस्थित रहने का मतलब ‘इस्तीफा’ या ‘काम छोड़ना’ नहीं होता। इसमें कर्मचारी का इरादा देखना जरूरी है।
- संवाद बना रहा: चूंकि याचिकाकर्ता लगातार पत्राचार (Representations) कर रहे थे, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उन्होंने स्वेच्छा से नौकरी छोड़ दी थी।
प्रक्रियात्मक चूक और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice)
- कोर्ट ने पाया कि EESL ने अपनी ही अनुशासन नियमावली (Discipline and Appeal Rules) का उल्लंघन किया।
- बिना जांच के बर्खास्तगी: कंपनी ने याचिकाकर्ता के आचरण को ‘कदाचार’ (Misconduct) माना, लेकिन इसके लिए न तो कोई चार्जशीट दी, न ही कोई जांच (Inquiry) बैठाई।
- सुनवाई का अवसर: कोर्ट ने दोहराया कि सेवा समाप्ति के नागरिक परिणाम (Civil Consequences) होते हैं, इसलिए कर्मचारी को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए था।
सरकारी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा कवच
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन सभी कर्मचारियों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है जो सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) या सरकारी उपक्रमों में कार्यरत हैं। यह स्पष्ट करता है कि सरकारी संस्थान अपनी मर्जी से किसी नियमित कर्मचारी को ‘अनुबंध’ की आड़ में बिना प्रक्रिया का पालन किए नहीं निकाल सकते। अनुशासन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन वह स्थापित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।

