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Marriage No Shield for Rape: जमानत के लिए निकाह करने का नाटक बर्दाश्त नहीं…पॉक्सो केस में कहा- कानून की छात्रा का मुकरना अविश्वसनीय, पढ़ें मामला

Marriage No Shield for Rape: दिल्ली हाई कोर्ट जस्टिस गिरीश कठपालिया की बेंच ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) के एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
आरोपबार-बार यौन उत्पीड़न, नाबालिग से बलात्कार (POCSO), गर्भपात।
बचाव का तर्कअब दोनों की शादी हो चुकी है, इसलिए जमानत दी जाए।
कोर्ट का निर्णयजमानत याचिका खारिज; शादी को ‘कानूनी चाल’ माना।
अहम टिप्पणीबालिग होने पर शादी करना पुराने ‘POCSO’ अपराध को खत्म नहीं करता।

पीड़िता दो बार गर्भवती हुई और उसका गर्भपात हुआ

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता से शादी करना बलात्कार के अपराध को खत्म नहीं करता और इस मामले में शादी केवल “जमानत पाने की एक चाल” (A ploy to get bail) प्रतीत होती है। यह मामला एक ऐसी पीड़िता से जुड़ा है जो नाबालिग (16 वर्ष) रहने के दौरान बार-बार यौन उत्पीड़न का शिकार हुई, दो बार गर्भवती हुई और उसका गर्भपात कराया गया। आरोपी ने गिरफ्तारी के बाद जेल में रहते हुए पीड़िता से ‘निकाह’ किया और इसी आधार पर जमानत मांगी थी।

कोर्ट का सख्त रुख: शादी एक दिखावा

  • अदालत ने उन मामलों से खुद को अलग किया जहाँ आरोपी और पीड़िता के बीच शादी या समझौते के बाद केस बंद कर दिए जाते हैं।
  • रणनीतिक निकाह: कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी ने शादी के लिए तभी सहमति दी जब वह गिरफ्तार होकर जेल चला गया। यह शादी “निकाहनामा” के जरिए जेल के दौरान ही की गई। कोर्ट ने कहा, “यह स्पष्ट है कि आरोपी ने बार-बार बलात्कार करने के बाद खुद को बचाने के लिए शादी को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया।
  • अपराध की गंभीरता: कोर्ट ने दोहराया कि आरोपी द्वारा बाद में की गई शादी उसे उन अपराधों से मुक्त (Absolve) नहीं करती जो उसने तब किए थे जब लड़की नाबालिग थी।

पीड़िता की गवाही पर सवाल: Law Student का तर्क

  • मामले में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब पीड़िता ने खुद आरोपी का समर्थन किया और FIR की सामग्री को झूठा बताया।
  • अज्ञानता का दावा: पीड़िता ने कहा कि उसे FIR की सामग्री के बारे में पता नहीं था क्योंकि उसके वकील ने इसे ड्राफ्ट किया था।
  • अदालत की असहमति: जस्टिस कठपालिया ने इस पर अविश्वास जताते हुए कहा कि पीड़िता कोई अनपढ़ महिला नहीं बल्कि ‘कानून की छात्रा’ (Law Student) है। यह मानना मुश्किल है कि एक लॉ स्टूडेंट बिना पढ़े इतनी गंभीर शिकायत पर हस्ताक्षर कर देगी।
  • झूठी गवाही का अंदेशा: कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क में दम पाया कि पीड़िता की गवाही प्रथम दृष्टया (Prima Facie) झूठी प्रतीत होती है और उसने मजिस्ट्रेट के सामने अपनी बात इसलिए नहीं बदली क्योंकि उसे ‘जेल जाने का डर’ दिखाया गया था—जो कि एक कानून की छात्रा के लिए विश्वसनीय तर्क नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि: सोशल मीडिया से शुरू हुई कहानी

  • शुरुआत: पीड़िता 16 साल की उम्र में फेसबुक के जरिए आरोपी के संपर्क में आई। आरोप है कि उसे नशीला पदार्थ पिलाकर उसका यौन उत्पीड़न किया गया।
  • झूठा वादा: आरोपी ने 18 साल की होने पर शादी का वादा कर शारीरिक संबंध जारी रखे। इस दौरान पीड़िता दो बार गर्भवती हुई।
  • धोखा: जब पीड़िता 2024 में बालिग (18+) हुई, तो आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया, जिसके बाद यह FIR दर्ज कराई गई।

न्याय प्रणाली के साथ खिलवाड़ नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो ‘शादी’ को POCSO जैसे गंभीर अपराधों से बचने का ‘एग्जिट रूट’ मानते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी, तो बाद में किया गया कोई भी समझौता या शादी उस जघन्य कृत्य की गंभीरता को कम नहीं करती। विशेष रूप से शिक्षित पीड़ितों द्वारा गवाही बदलने को कोर्ट ने “न्यायिक प्रक्रिया के साथ मजाक” माना है।

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