POCSO Case Verdict: दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने पॉक्सो केस में स्पष्ट कहा, नाबालिग की सहमति, कानून की नजर में कोई सहमति नहीं है।
अदालत द्वारा सुनाई गई सजा की धाराएं
| धारा (Sections) | विवरण |
| धारा 363 IPC | अपहरण (Kidnapping) |
| धारा 366 IPC | शादी के लिए मजबूर करने हेतु अपहरण। |
| धारा 342 IPC | गलत तरीके से बंधक बनाना (Wrongful Confinement)। |
| धारा 6 POCSO | गंभीर यौन हमला (Aggravated Sexual Assault)। |
निचली अदालत के फैसले को गंभीर त्रुटि करार दिया
अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत एक आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। कोर्ट ने आरोपी को अपहरण, गलत तरीके से बंधक बनाने और ‘एग्रवेटेड पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ (धारा 6, POCSO) के तहत दोषी करार दिया। यह मामला 16 वर्षीय लड़की के अपहरण और यौन उत्पीड़न से जुड़ा था। निचली अदालत ने उम्र के मुद्दे पर आरोपी को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी कर दिया था, जिसे हाई कोर्ट ने “गंभीर त्रुटि” माना।
सहमति का कानूनी शून्य होना (Consent is Irrelevant)
- अदालत ने POCSO अधिनियम की कठोरता को स्पष्ट किया।
- कानूनी स्थिति: कोर्ट ने कहा कि भले ही पीड़िता ने विरोध न किया हो या वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ रही हो, यह कृत्य को कानूनी नहीं बना देता। कानून किसी भी परिस्थिति में नाबालिग को यौन गतिविधि के लिए सहमति देने के योग्य नहीं मानता।
- रिश्ते की दलील: आरोपी ने दावा किया था कि उनके बीच प्रेम संबंध था और वह शादी करना चाहता था। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि POCSO एक्ट के तहत वैधानिक निषेध (Statutory Prohibition) किसी भी आपसी रिश्ते या सहमति से ऊपर है।
उम्र के निर्धारण पर ‘पब्लिक डॉक्यूमेंट’ का महत्व
- हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा जन्म प्रमाण पत्र को नजरअंदाज करने पर कड़ी आपत्ति जताई।
- नगर निगम का प्रमाण पत्र: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि म्युनिसिपल कॉरपोरेशन द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र एक सार्वजनिक दस्तावेज है। यदि बचाव पक्ष ने इसकी प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी है, तो इसे विश्वसनीय साक्ष्य माना जाना चाहिए।
- देरी से पंजीकरण (Delayed Registration): ट्रायल कोर्ट ने देर से पंजीकरण के आधार पर सर्टिफिकेट को संदिग्ध माना था। हाई कोर्ट ने इसे गलत बताते हुए कहा कि ग्रामीण या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में जागरूकता की कमी के कारण देरी होना सामान्य है और केवल इस आधार पर वैध दस्तावेज को खारिज नहीं किया जा सकता।
- दस्तावेज बनाम मौखिक बयान: कोर्ट ने कहा कि मां के मौखिक बयान में साल की मामूली विसंगति, एक वैधानिक दस्तावेजी साक्ष्य (Statutory Document) की जगह नहीं ले सकती।
संदेह का लाभ’ बनाम ‘तार्किक आधार
दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि निचली अदालत ने जो ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) आरोपी को दिया था, वह किसी उचित आधार पर नहीं बल्कि “काल्पनिक तर्क” (Speculative Reasoning) पर आधारित था। अभियोजन पक्ष ने सफलतापूर्वक साबित किया कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
नाबालिगों की सुरक्षा के प्रति जीरो टॉलरेंस
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर स्थापित करता है कि POCSO अधिनियम के मामलों में ‘सहमति’ (Consent) या ‘प्रेम संबंध’ का बचाव कानूनी रूप से मान्य नहीं है। कानून का प्राथमिक उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, और इस सुरक्षा घेरे को किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं किया जा सकता।

