केस मैट्रिक्स: Expansion of ‘Emergency’ Definition for Differently Abled
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court) |
| माननीय जज | जस्टिस एच.एस. ब्रार (Justice H.S. Brar) |
| याचिकाकर्ता | सुनील कुमार (सहायक/क्लर्क, हरियाणा सरकार) |
| संबंधित बीमारी | एमीओट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS – Motor Neuron Disease) |
| स्वीकृत राशि | ₹3,95,000/- (₹3.95 Lakhs) + सुपरन्यूमरेरी पद का सृजन |
| संविधान/कानून | भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 एवं दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 |
Expansion of ‘Emergency’ Definition: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चिकित्सा प्रतिपूर्ति (Medical Reimbursement) के मामलों में ‘आपात्कालीन स्थिति’ (Emergency) की कानूनी परिभाषा का विस्तार करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
जस्टिस एच.एस. ब्रार (Justice H.S. Brar) की पीठ ने स्पष्ट किया कि एमीओट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) जैसी गंभीर और प्रगतिशील बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए ‘एमर्जेंसी’ के दायरे को व्यापक बनाया जाना चाहिए, जिसमें शारीरिक अंगों का तेजी से और अपरिवर्तनीय निष्प्रभावी होना भी शामिल है। अदालत ने कहा कि आपातकाल की पारंपरिक अवधारणा—जो केवल त्वरित मृत्यु या गंभीर चिकित्सा संकट को मानती है—मूल रूप से सक्षम/सामान्य (Able-bodied) लोगों के दृष्टिकोण पर आधारित है।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
अदालत ने अनुच्छेद 21 (Article 21 – Right to Life) और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) के आलोक में राज्य सरकार की जिम्मेदारियों को रेखांकित किया।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: एमीओट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) जैसी प्रगतिशील अपक्षयी पुरानी बीमारियों (Progressive Degenerative Chronic Diseases) से पीड़ित व्यक्तियों के लिए ‘एमर्जेंसी’ का दायरा व्यापक होना चाहिए। इसमें शारीरिक अंगों का तेजी से और स्थायी रूप से काम बंद कर देना भी शामिल है, जिससे दैनिक कार्य करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
राज्य सरकार नागरिकों से यह अपेक्षा नहीं कर सकती कि वे केवल इसलिए समय पर इलाज न कराएं क्योंकि अस्पताल पैनल में शामिल (Non-empanelled) नहीं है। सरकार का ऐसा रुख संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।”*
मामला क्या था?: क्लर्क सुनील कुमार की याचिका
- पीड़ित की स्थिति: हरियाणा सरकार में क्लर्क के रूप में कार्यरत सुनील कुमार एएलएस (ALS – Motor Neuron Disease) नामक असाध्य बीमारी से पीड़ित हैं, जिसके कारण उनके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके हैं और वे 100% स्थायी दिव्यांगता से ग्रस्त हैं।
- दावे की अस्वीकृति: अक्टूबर 2024 में उन्होंने बैंगलोर स्थित ‘प्लेक्सस न्यूरो एंड स्टेम सेल रिसर्च सेंटर’ (गैर-सूचीबद्ध अस्पताल) में इलाज कराया और ₹3.95 लाख के बिल की प्रतिपूर्ति मांगी। राज्य सरकार ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि इलाज ‘आपातकालीन स्थिति’ में नहीं कराया गया था।
- हाई कोर्ट का आदेश:
- ₹3.95 लाख की प्रतिपूर्ति: हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को तत्काल ₹3.95 लाख का भुगतान करे।
- सुपरन्यूमरेरी पद का सृजन: 100% दिव्यांगता को देखते हुए उनके लिए सुपरन्यूमरेरी पद (Supernumerary Post) सृजित किया जाए।
- वेतन समायोजन: अगस्त 2025 के बाद से पद सृजन तक उनके द्वारा ली गई अवैतनिक छुट्टी (Leave Without Pay) को नियमित सेवा माना जाए।
फैसले का संवैधानिक एवं सामाजिक प्रभाव
- उचित समावेशन (Reasonable Accommodation): यह फैसला दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत गैर-भेदभाव और उचित समायोजन के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है।
- आवश्यकता एवं आपातकाल की परीक्षा (Test of Essentiality and Emergency): यदि कोई मरीज डॉक्टर की सलाह पर जीवन और शारीरिक क्षमताओं को बचाने के लिए गैर-सूचीबद्ध अस्पताल में इलाज कराता है, तो राज्य उसे वित्तीय मुआवजे से वंचित नहीं कर सकता।

