केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस एम.एम. सुंदरेश एवं जस्टिस प्रसन्न बी. वराले |
| केस का नाम | सायरा खातून उर्फ शायरा खातून एवं अन्य बनाम बिहार राज्य व अन्य |
| चुनौतीपूर्ण नीति | बिहार सरकार का 10 दिसंबर 2014 का अनुकंपा नियुक्ति परिपत्र |
| अपीलाकर्ता के वकील | एडवोकेट रश्मि सिंह, प्रियांशा शर्मा और सुभान शंकर गोगोई |
| प्रतिवादी (राज्य) के वकील | एडवोकेट मनीष कुमार, दिव्यांश मिश्रा और कुमार सौरव |
| कोर्ट का अंतिम निर्णय | नीति असंवैधानिक घोषित; 8 सप्ताह में दावों के निपटारे का निर्देश। |
Compassionate Appointment: बेटियों के संवैधानिक अधिकारों और लैंगिक समानता (Gender Equality) के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार की 2014 की उस नीति को खारिज कर दिया है, जिसके तहत केवल ‘तलाकशुदा’ या ‘परित्यक्ता’ (पति द्वारा छोड़ी गई) बेटियों को ही अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) का पात्र माना जाता था।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले (Justice Prasanna B. Varale) की पीठ ने 23 जुलाई को पारित आदेश में पटना हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि कानून में यह धारणा कभी नहीं बनाई जा सकती कि विवाह के बाद बेटी का अपने माता-पिता के परिवार से संबंध पूरी तरह समाप्त हो जाता है [सायरा खातून उर्फ शायरा खातून एवं अन्य बनाम बिहार राज्य व अन्य]।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी सिद्धांत
अनुकंपा नियुक्ति में लैंगिक समानता पर शीर्ष अदालत
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बेटे और बेटी में भेदभाव असंवैधानिक
• संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन।
• अनुकंपा नियुक्ति में बेटे-बेटी का भेद खत्म।
शादी से मायके का नाता खत्म नहीं
• यह धारणा गलत है कि शादी के बाद बेटी
माता-पिता के परिवार से पूरी तरह अलग हो जाती है।
अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन
अदालत ने बिहार सरकार की नीति को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा, नीति का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि पात्रता को केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटी तक सीमित करने वाले वर्गीकरण को कानून की नजर में बरकरार नहीं रखा जा सकता। कानून में ऐसी कोई पूर्वधारणा नहीं हो सकती कि शादी के बाद एक बेटी अपने पैतृक परिवार से संबंध तोड़ लेती है और अपने ससुराल में ही रहती है।
अति-तकनीकी (Hyper-technical) रवैया गलत
पीठ ने कहा कि बेटे और बेटी के बीच अंतर करने वाला कोई भी वर्गीकरण असंवैधानिक है। यदि कोई बेटी अपने माता-पिता की देखभाल कर रही है या उनके साथ रह रही है, तो केवल कानूनी रूप से औपचारिक तलाक न होने जैसे अति-तकनीकी तर्कों के आधार पर उसकी अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- पति की मृत्यु के बाद दावा: एक विधवा महिला ने अपने पति की मृत्यु के बाद अपनी बेटी के लिए अनुकंपा के आधार पर नौकरी की मांग की थी।
- बिहार सरकार का इनकार: बिहार सरकार ने 10 दिसंबर 2014 की अपनी नीति का हवाला देते हुए आवेदन खारिज कर दिया, जिसमें प्रावधान था कि केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटियां ही अनुकंपा नियुक्ति की हकदार होंगी।
- पटना हाई कोर्ट द्वारा याचिका खारिज: विधवा और उसकी बेटी ने इस अस्वीकृति को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- सुप्रीम कोर्ट में तर्क: याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि बेटी का औपचारिक तलाक भले न हुआ हो, लेकिन वह अपने मायके में ही रह रही थी और परिवार को सहारा दे रही थी। साथ ही 2014 की नीति अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- पटना HC और बिहार सरकार का आदेश रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले और बिहार सरकार के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया, जिसके तहत अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज किया गया था।
- 8 सप्ताह की समयसीमा: शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह महिला की बेटी के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर 8 सप्ताह (दो महीने) के भीतर गुण-दोष (Merits) के आधार पर पुनर्विचार करे और उचित आदेश जारी करे।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश भर में सरकारी नौकरियों में अनुकंपा नियुक्ति के संदर्भ में महिलाओं के अधिकारों को मजबूती प्रदान करता है। यह स्पष्ट संदेश है कि विवाह के आधार पर किसी बेटी को उसके माता-पिता की अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से वंचित करना लैंगिक भेदभाव और असंवैधानिक है।

