Soldier benefits: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा, अगर कोई सैनिक किसी सैन्य ऑपरेशन के दौरान साथी सैनिक की गोली से मारा जाता है, तो उसके परिवार को उन सभी लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता जो युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों को मिलते हैं।
रुक्मणी देवी की याचिका पर आया फैसला
यह फैसला रुक्मणी देवी की याचिका पर आया, जिनके बेटे की मौत 21 अक्टूबर 1991 को जम्मू-कश्मीर में ‘ऑपरेशन रक्षक’ के दौरान साथी सैनिक की गोली से हो गई थी। रुक्मणी देवी को ‘लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन’ देने के आदेश को केंद्र सरकार ने चुनौती दी थी। लेकिन हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 16 जुलाई को केंद्र की अपील खारिज कर दी। एक अहम फैसले में कोर्ट ने कहा कि सैनिक की मौत ऑपरेशन के दौरान हुई थी, इसलिए इसे ‘बैटल कैजुअल्टी’ माना जाएगा।
25 साल की देरी पर भी नहीं रोका जा सकता हक
केंद्र सरकार ने यह भी तर्क दिया कि रुक्मणी देवी ने 2018 में दावा किया, जबकि उनके बेटे की मौत 1991 में हुई थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि पेंशन एक सतत अधिकार है और देरी के आधार पर इसे रोका नहीं जा सकता।
ऑपरेशन रक्षक में तैनाती थी, इसलिए नियम लागू होंगे
कोर्ट ने कहा कि रक्षा मंत्रालय की जनवरी 2001 की गाइडलाइन के अनुसार, किसी भी सैन्य ऑपरेशन के दौरान हुई मौतें ‘कैटेगरी E’ में आती हैं और उन पर विशेष लाभ लागू होते हैं।
ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया
ऑर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) ने रुक्मणी देवी के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे केंद्र ने यह कहकर चुनौती दी थी कि यह मामला ऑपरेशन पराक्रम से जुड़ा नहीं है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि सैनिक की मौत ऑपरेशन रक्षक के दौरान हुई थी, इसलिए लाभ मिलना चाहिए।
लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन क्या है?
यह सामान्य पारिवारिक पेंशन से अधिक लाभ देती है। यह उन परिवारों को दी जाती है जिनके सदस्य सैन्य ऑपरेशन के दौरान ड्यूटी पर मारे गए हों।
यह रहा निष्कर्ष
कोर्ट ने साफ किया कि ऑपरेशन में तैनात सैनिक की मौत चाहे किसी भी कारण से हो, अगर वह ड्यूटी पर था, तो उसके परिवार को सभी निर्धारित लाभ मिलने चाहिए।

