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Bail Matter: स्वतंत्रता की रक्षा जरूरी, पर पीड़ितों की पीड़ा पर आंखें मूंदना ठीक नहीं…क्यों रही सुप्रीम टिप्पणी

Bail Matter: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहां एक ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा महत्वपूर्ण है, वहीं अदालतों को पीड़ितों की पीड़ा पर “आंखें मूंद” नहीं लेनी चाहिए।

मार्च 2024 के पटना हाईकोर्ट का आदेश रद्द

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए मार्च 2024 के पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हत्या के एक मामले के दो आरोपियों को अग्रिम जमानत दी गई थी। शीर्ष अदालत ने इस मामले को जिस जल्दबाजी में हाईकोर्ट ने निपटाया, उस पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट दोनों को अग्रिम जमानत पर समान अधिकार देती है, लेकिन बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि हाईकोर्ट को सीधे हस्तक्षेप करने से पहले सेशन कोर्ट के विकल्प को इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे सभी पक्षों के हित संतुलित रहते हैं और हाईकोर्ट को यह देखने का अवसर भी मिलता है कि सेशन कोर्ट ने अपने न्यायिक दृष्टिकोण से मामले को कैसे परखा है।

बिना कोई कारण दर्ज किए सीधे अग्रिम जमानत दे दी…

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने बिना शिकायतकर्ता को पक्षकार बनाए और बिना कोई कारण दर्ज किए सीधे अग्रिम जमानत दे दी, जो उचित नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा महत्वपूर्ण है, वहीं अदालतों को पीड़ितों की पीड़ा को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। एक संतुलन बनाना आवश्यक है, ताकि आरोपी की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और पीड़ितों के मन में भयमुक्त वातावरण भी बना रहे।”पीठ ने 17 सितंबर के आदेश में कहा कि जमानत देना अदालत का विवेकाधीन अधिकार है, लेकिन इस विवेक का इस्तेमाल सतर्कता और न्यायसंगत तरीके से होना चाहिए। “इस मामले में यह विवेक बिल्कुल भी उचित नहीं था, खासकर अग्रिम जमानत के चरण पर।

हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता का सही आकलन नहीं किया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता का सही आकलन नहीं किया। “हमें समझ नहीं आता कि इतने जघन्य अपराध में हाईकोर्ट को किस बात ने प्रेरित किया कि वह सीधे अग्रिम जमानत दे दे,” पीठ ने टिप्पणी की। अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता की पत्नी की हत्या दिनदहाड़े की गई थी। शीर्ष अदालत शिकायतकर्ता की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिसंबर 2023 में दर्ज एफआईआर में आरोपियों को मिली अग्रिम जमानत को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी चार हफ्तों के भीतर आत्मसमर्पण करें और उसके बाद नियमित जमानत के लिए आवेदन करें।

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