CASH-DEBT: केरल हाईकोर्ट ने कहा, अगर कोई व्यक्ति 20 हजार रुपए से ज्यादा की रकम कैश में देता है तो वह कर्ज कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा, जब तक कि उसके पीछे कोई वैध कारण न हो।
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट मामले में सुनवाई
एक अहम फैसला सुनाते हुए जस्टिस पीवी कुन्हिकृष्णन ने यह फैसला एक चेक बाउंस केस में आरोपी की सजा और जुर्माना रद्द करते हुए सुनाया। निचली अदालत ने आरोपी को एक साल की सजा और 9 लाख रुपए का जुर्माना सुनाया था। यह सजा नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दी गई थी।
आयकर कानून के उल्लंघन का लगा था आरोप
अपील में आरोपी ने कहा कि शिकायतकर्ता ने उसे 9 लाख रुपए कैश में दिए थे, जो आयकर कानून के अनुसार अवैध है। इसलिए यह कर्ज कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आरोपी की दलील से सहमति जताते हुए कहा कि अगर कोई अदालत ऐसे लेन-देन को वैध मानती है, तो यह देश की उस नीति के खिलाफ होगा, जिसमें 20 हजार रुपए से ज्यादा के कैश लेन-देन को हतोत्साहित किया गया है।
डिजिटल इंडिया के सपने से जुड़ा है फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि 20 हजार रुपए से ज्यादा के कैश लेन-देन को हतोत्साहित करना देश के डिजिटल इंडिया अभियान का हिस्सा है, जिसे प्रधानमंत्री ने कालेधन और समानांतर अर्थव्यवस्था पर रोक लगाने के लिए शुरू किया है।
अवैध लेन-देन को वैध ठहराना गलत
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कर्ज अवैध लेन-देन से जुड़ा है, तो उसे कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता। अगर अदालतें ऐसे लेन-देन को वैध ठहराएंगी, तो इससे नागरिकों को अवैध लेन-देन करने की छूट मिल जाएगी और काला धन सफेद में बदल जाएगा।
चेक लेने वाले को देना होगा सबूत
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी को यह साबित करना होगा कि लेन-देन अवैध था और उसे चेक किसी वैध कर्ज या देनदारी के बदले नहीं मिला। इस केस में आरोपी ने यह साबित किया कि शिकायतकर्ता के पास 9 लाख रुपए उधार देने का स्रोत नहीं था, इसलिए यह कर्ज कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता।
20 हजार रुपये से ज्यादा रकम वापसी की जिम्मेदारी उठानी होगी: कोर्ट
कोर्ट ने आरोपी की सजा और जुर्माना रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया। साथ ही कहा कि अगर कोई व्यक्ति आयकर कानून का उल्लंघन करते हुए 20 हजार रुपए से ज्यादा की रकम कैश में देता है और बदले में चेक लेता है, तो उसे खुद ही अपनी रकम वापस लेने की जिम्मेदारी उठानी होगी, जब तक कि उसके पास वैध कारण न हो।
फैसले का असर भविष्य के मामलों पर होगा
हाईकोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला भविष्य के मामलों पर लागू होगा। यानी यह फैसला प्रोस्पेक्टिव नेचर का होगा।

