Tuesday, July 21, 2026
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Cheque Bounce Law: विड्रॉल स्लिप भी है एक चेक है, बाउंस होने पर होगी जेल…कहा-नाम नहीं, काम मायने रखता है

Cheque Bounce Law: केरल हाई कोर्ट ने परकाम्य लिखित अधिनियम (Negotiable Instruments Act) के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सी.एस. डायस की बेंच ने चेक बाउंस मामले में कार्यवाही रद्द करने (Quash) की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई दस्तावेज ‘चेक’ की तरह काम कर रहा है, तो केवल उसका नाम ‘विड्रॉल स्लिप’ होने से वह कानून के दायरे से बाहर नहीं हो जाता। कोर्ट ने माना कि एक सहकारी बैंक (Co-operative Bank) द्वारा जारी ‘विड्रॉल स्लिप’ (Withdrawal Slip) को भी कानून की नजर में ‘चेक’ माना जा सकता है, और इसके बाउंस होने पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • शिकायत: टोमी ईपन ने क्लारा डोमिनिक के खिलाफ चेक बाउंस (Section 138 NI Act) का मामला दर्ज कराया था।
  • बचाव पक्ष का तर्क: आरोपी महिला ने हाई कोर्ट में दलील दी कि जिस दस्तावेज के आधार पर केस हुआ है, वह चेक नहीं बल्कि एक को-ऑपरेटिव सोसाइटी बैंक की ‘विड्रॉल स्लिप’ है। उनका तर्क था कि को-ऑपरेटिव सोसाइटी के पास RBI का लाइसेंस नहीं है, इसलिए वह ‘बैंकर’ नहीं है और यह केस अवैध है।

कोर्ट का फैसला: ‘बैंकर’ की परिभाषा व्यापक है

  • अदालत ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कुछ महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किए।
  • संस्था का कार्य: कोर्ट ने कहा कि ‘बैंकर’ शब्द का दायरा बहुत बड़ा है। इसमें वे सभी संस्थान शामिल हैं जो बैंकिंग कार्य (जमा स्वीकार करना और निकासी की अनुमति देना) करते हैं, चाहे उनके पास औपचारिक लाइसेंस हो या न हो।
  • लेबल बनाम कार्य (Substance vs Nomenclature): कोर्ट ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि लेन-देन के सार (Substance) को देखा जाना चाहिए, न कि उसके नाम (Nomenclature) को। यदि विड्रॉल स्लिप का उपयोग भुगतान के आदेश के रूप में किया गया है, तो वह ‘चेक’ ही कहलाएगा।

कानूनी निष्कर्ष: केस चलेगा

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत (पाल मजिस्ट्रेट कोर्ट) में चल रही कार्यवाही को रोकने से इनकार कर दिया।
  • कानूनी वैधता: कोर्ट ने माना कि इस स्तर पर शिकायत को कानूनी रूप से गलत नहीं कहा जा सकता।
  • ट्रायल का अधिकार: कोर्ट ने आरोपी को छूट दी कि वह ट्रायल के दौरान अपनी बात रख सकती है, लेकिन वर्तमान में केस को रद्द करने का कोई ‘असाधारण आधार’ (Exceptional Grounds) नहीं है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य सवालक्या को-ऑपरेटिव बैंक की विड्रॉल स्लिप पर 138 NI Act लग सकता है?
कोर्ट का जवाबहाँ, यदि वह भुगतान के निर्देश के रूप में उपयोग हुई है।
बैंकर का अर्थकेवल कमर्शियल बैंक नहीं, बल्कि बैंकिंग कार्य करने वाली सोसायटियां भी इसमें शामिल हैं।
आदेशयाचिका खारिज; ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से सुनवाई जारी रखेगा।

सहकारी संस्थाओं के लिए बड़ी राहत

यह फैसला उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो सहकारी समितियों या सोसायटियों के माध्यम से वित्तीय लेनदेन करते हैं और यह सोचते हैं कि वहाँ की स्लिप या चेक बाउंस होने पर उन पर ‘चेक बाउंस’ का कड़ा कानून लागू नहीं होगा। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून की नजर में सुरक्षा और जवाबदेही संस्था के नाम से ज्यादा उसके काम पर निर्भर करती है।

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