Friday, October 9, 2026
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Corruption Probe: भ्रष्टाचार देश का दुश्मन है…अब पुणे के पूर्व मुख्य नगर अभियंता के 2,000 करोड़ की संपत्ति की जांच होगी

Corruption Probe: बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे नगर निगम (PMC) के तत्कालीन आयुक्त के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिन्होंने एक वरिष्ठ नागरिक अधिकारी के खिलाफ 2,000 करोड़ रुपये की बेहिसाब संपत्ति (Disproportionate Assets) की जांच रोक दी थी।

हाईकोर्ट के जस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह राजा भोसले की बेंच ने तत्कालीन पीएमसी कमिश्नर सौरभ राव द्वारा 2019 में जारी उन आदेशों को ‘अवैध’ करार दिया, जिनमें आरोपी अधिकारी के खिलाफ जांच की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट के इस फैसले से पूर्व मुख्य नगर अभियंता प्रशांत वाघमारे के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की ‘ओपन इंक्वायरी’ का रास्ता साफ हो गया है।

मामला क्या था? (The ₹2,000 Crore Allegation)

  • आरोप: पूर्व मुख्य नगर अभियंता प्रशांत वाघमारे पर आरोप है कि उन्होंने अपने 22 साल के कार्यकाल के दौरान अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से लगभग 2,000 करोड़ रुपये अधिक की संपत्ति जमा की।
  • साजिश: शिकायत के अनुसार, यह संपत्ति परिवार के सदस्यों और उनसे जुड़ी कई कंपनियों के माध्यम से रूट की गई थी।
  • ACB की रिपोर्ट: शुरुआती गोपनीय जांच में ACB ने पाया कि वाघमारे ने अपनी संपत्ति, निवेश और विदेश यात्राओं की जानकारी देने में सहयोग नहीं किया। इसके बाद ACB ने ‘ओपन इंक्वायरी’ की सिफारिश की थी।

कमिश्नर की ‘अति-उत्साही’ भूमिका पर कोर्ट की फटकार

  • हाई कोर्ट ने तत्कालीन कमिश्नर के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई।
  • अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी (Commissioner) का काम केवल यह देखना है कि क्या जांच के लिए प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई मामला बनता है। वह खुद ‘जांच अधिकारी’ बनकर आरोपी को क्लीन चिट नहीं दे सकता।
  • धारा 17A की गलत व्याख्या: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता उन कार्यों के लिए होती है जो आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए हों। बेहिसाब संपत्ति जमा करना आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसके लिए ऐसी सुरक्षा नहीं दी जा सकती।

कोर्ट की तीखी टिप्पणियां: “भ्रष्टाचार और अर्थव्यवस्था”

  • अदालत ने भ्रष्टाचार के सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभाव पर कड़ा रुख अपनाया।
  • देश का दुश्मन: “भ्रष्टाचार राष्ट्र का दुश्मन है। भ्रष्टाचार करने वाले लोक सेवक को ट्रैक करना और सजा देना कानून का अनिवार्य जनादेश है।”
  • नैतिक ताना-बाना: लोक सेवकों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार न केवल समाज के नैतिक ताने-बाने को नष्ट करता है, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और देश की छवि के लिए भी हानिकारक है।
  • अधिकारी का बचाव: कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि तत्कालीन आयुक्त ने अपने अधिकारी को बचाने के लिए ‘अति-उत्साह’ दिखाते हुए खुद ही जांच अधिकारी की भूमिका निभा ली।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निर्णय
आरोपीप्रशांत वाघमारे (पूर्व मुख्य नगर अभियंता, PMC)
संपत्ति का मूल्यलगभग ₹2,000 करोड़ (कथित)
हाई कोर्ट का आदेशतत्कालीन कमिश्नर के सुरक्षात्मक आदेश रद्द, ACB जांच बहाल।
कानूनी सिद्धांतआय से अधिक संपत्ति के मामले धारा 17A के सुरक्षा कवच में नहीं आते।

निष्कर्ष: पारदर्शिता की जीत

पुणे के कार्यकर्ता तानाजी गंभिरे की याचिका पर आए इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी अपने अधीनस्थों के भ्रष्टाचार पर पर्दा नहीं डाल सकते। अब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) स्वतंत्र रूप से वाघमारे की चल-अचल संपत्तियों की गहराई से जांच कर सकेगा।

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