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Cross-Border Custody: अमेरिका में जन्मी बच्ची को भारत में रहने की अनुमति दी…यह कैसे हुआ, सभी बातें इस फैसले को पढ़ने से स्पष्ट होंगी

Cross-Border Custody: दिल्ली हाई कोर्ट ने अमेरिका (US) में जन्मी एक बच्ची की कस्टडी के विवाद में एक बड़ा और भावुक कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है।

11 साल की बच्ची अब भारत के माहौल में ढल चुकी

हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने पति और पत्नी द्वारा दायर कस्टडी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि 11 साल की बच्ची अब भारत के माहौल और शिक्षा प्रणाली में पूरी तरह ढल चुकी है। अदालत ने फैसला सुनाया है कि भले ही विदेशी अदालतों के आदेश सम्मान के हकदार हैं, लेकिन जब किसी बच्चे की जड़ें भारत में ‘गहरी’ (Deep Roots) जम चुकी हों, तो विदेशी अदालत का आदेश कस्टडी तय करने का “एकमात्र कारक” नहीं हो सकता।

“अमेरिकी नागरिकता” ही सब कुछ नहीं

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जन्म से अमेरिकी नागरिक होना कस्टडी तय करने का आधार नहीं हो सकता।
  • भारत में जड़ें: “बच्ची पिछले 4 वर्षों से भारत में रह रही है और यहाँ शिक्षा प्राप्त कर रही है। वह अब 11 साल की है। केवल इसलिए कि वह जन्म से US नागरिक है या उसके माता-पिता वहां रहे थे, उसे उसकी वर्तमान परिस्थितियों से उखाड़ा नहीं जा सकता।”
  • अभिभावकों की स्थिति: कोर्ट ने नोट किया कि माता-पिता दोनों भारतीय नागरिक हैं। पिता के पास US में काम करने की अनुमति है, लेकिन माँ के पास नहीं। यदि बच्ची को वापस भेजा जाता है, तो माँ को भी मजबूरन वहां जाना होगा, बिना किसी सुरक्षा या रहने की निश्चितता के।

विदेशी अदालतों के आदेश बनाम बच्चे का कल्याण

  • हाई कोर्ट ने अमेरिका की ‘सुपीरियर कोर्ट ऑफ न्यू हेवन’ के 2022 के आदेशों पर टिप्पणी की।
  • सम्मान लेकिन बाध्यता नहीं: कोर्ट ने कहा कि विदेशी अदालतों के आदेशों का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन वे केवल ‘परक’ (Persuasive) प्रभाव रखते हैं। सर्वोपरि विचार हमेशा ‘बच्चे का कल्याण’ (Welfare of the child) होना चाहिए।
  • पत्नी का आचरण: कोर्ट ने माना कि पत्नी का बच्ची को भारत लाना पूरी तरह से ‘नेक नीयत’ (Bona fide) नहीं था और उसे अमेरिकी अदालत में ही अपील करनी चाहिए थी। सामान्य परिस्थितियों में कोर्ट पिता की याचिका स्वीकार कर लेता, लेकिन बच्ची के भविष्य को देखते हुए ऐसा नहीं किया गया।

गंभीर आरोप और कानूनी लड़ाई

  • यौन शोषण के आरोप: पत्नी ने पति पर बच्ची के साथ यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे। अमेरिका में पति को गिरफ्तार भी किया गया था, लेकिन वहां की कोर्ट ने इन आरोपों में दम नहीं पाया था।
  • घरेलू हिंसा: हालांकि, पति के खिलाफ पत्नी द्वारा लगाए गए घरेलू हिंसा के आरोप सही पाए गए थे।
  • तर्क: पत्नी के वकील (जय अनंत देहाद्रई) ने तर्क दिया कि बच्ची पर इन घटनाओं का गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ा है। वहीं, पति के वकील (शादान फरासत) ने दलील दी कि पत्नी ने बच्चे को ‘ट्यूटर’ (सिखाया-पढ़ाया) किया है और वह अवैध रूप से बच्ची को भारत लाई है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निष्कर्ष
बच्ची की उम्र और शिक्षा11 साल; भारत में पढ़ाई कर रही है, इसे बदलना ‘विघटनकारी’ होगा।
विदेशी कोर्ट का आदेशआदरणीय है, लेकिन ‘अंतिम सत्य’ नहीं।
नागरिकताअमेरिकी नागरिकता बच्चे को जबरन वापस भेजने का एकमात्र आधार नहीं है।
अंतिम निर्णयदोनों याचिकाएं खारिज; माता-पिता को गार्जियनशिप के लिए अन्य कानूनी विकल्प खुले रखे गए।

निष्कर्ष: ‘वतन’ की जड़ें बनाम ‘विदेशी’ कानून

यह फैसला उन भारतीय माता-पिता के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है जो विदेशों में बस गए हैं लेकिन वैवाहिक विवादों के कारण भारत लौट आते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह यांत्रिक रूप से विदेशी आदेशों का पालन नहीं करेगा, बल्कि यह देखेगा कि बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए सबसे सुरक्षित जगह कौन सी है।

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