Monday, February 16, 2026
HomeLaworder HindiDEATH ROW: जल्दबाजी में दी गई फांसी की सजा कानून के राज...

DEATH ROW: जल्दबाजी में दी गई फांसी की सजा कानून के राज को कमजोर करती है…यह रही सुप्रीम टिप्पणी

DEATH ROW: सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में दर्ज एक दुष्कर्म और हत्या के मामले में मृत्युदंड पाए कैदी को बरी कर दिया।

अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला सिद्ध करने में असफल

अदालत ने कहा कि जल्दबाज़ी में फांसी की सजा देना rule of law (क़ानून के राज) को कमजोर करता है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संपूर्ण और अबाधित परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला सिद्ध करने में असफल रहा। साथ ही उस सह-आरोपी को भी बरी कर दिया गया जिसे सात साल की कैद की सजा मिली थी। यह मामला नवंबर 2014 में उत्तराखंड के काठगोदाम थाने में दर्ज हुआ था। अदालत ने कहा कि जब दो व्याख्याएं संभव हों, तो आरोपी के पक्ष वाली व्याख्या अपनाई जानी चाहिए। ऐसे हालात में दोषसिद्धि कायम रखना ही असुरक्षित है, फांसी जैसी कठोर सजा तो दूर की बात है। यह मामला 21 नवंबर 2014 को दर्ज हुआ था, जब पीड़िता के पिता ने गुमशुदगी की शिकायत दी थी। चार दिन बाद उसका शव बरामद हुआ था।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

  • DEATH ROW:
  • फांसी की सजा केवल “rarest of rare” मामलों में दी जानी चाहिए।
  • अभियोजन पक्ष के केस में थोड़ी भी शंका या कमी हो तो फांसी की सजा नहीं दी जा सकती।
  • जल्दबाज़ी या यांत्रिक तरीके से मृत्युदंड देना न्याय का सबसे बड़ा दुरुपयोग है।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियाँ अभियोजन के साक्ष्यों पर:

  • पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) पर आधारित था—जैसे उद्देश्य (motive), “last seen together” थ्योरी और फोरेंसिक सबूत।
  • अभियोजन आरोपी का कोई स्पष्ट या ठोस उद्देश्य सिद्ध नहीं कर पाया।
  • “last seen” थ्योरी विरोधाभासी साबित हुई।
  • वैज्ञानिक और डीएनए साक्ष्य गंभीर खामियों और असंगतियों से ग्रसित पाए गए।
  • अदालत ने कहा कि डीएनए रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि नमूने लेने और जांच की प्रक्रिया ही संदिग्ध थी।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments