अदालत की मुख्य टिप्पणियां: “समय बदल चुका है”
- ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत का पुनर्मूल्यांकन:न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता ने कहा कि हत्या जैसे मामलों में मृत्युदंड देने के पारंपरिक संयम पर अब पुनर्विचार की जरूरत है:“समय बदल गया है। पहले के दिनों में हत्या के मामले में मृत्युदंड ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare Cases) के आधार पर दिया जाता था, क्योंकि हत्याएँ दुर्लभ थीं। क्या अब भी वैसा ही है? अब हत्या कोई दुर्लभ अपराध नहीं रह गया है।”
- अत्यधिक क्षमा का परिणाम:जस्टिस दत्ता ने कड़े शब्दों में कहा:“हमारी क्षमाशील प्रवृत्ति के कारण ही भारत इन समस्याओं का सामना कर रहा है। क्षमा करो, क्षमा करो, क्षमा करो—आपको कहीं न कहीं एक सीमा रेखा खींचनी होगी। इसीलिए हम कहते हैं कि हमारी क्षमाशील प्रवृत्ति का कहीं न कहीं अंत होना ही चाहिए।”
- पुराने मामले की मिसाल (पारोल का दुरुपयोग):जस्टिस दत्ता ने एक दर्दनाक अतीत का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे एक मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने पर दोषी ने जेल से बाहर आकर दोबारा जघन्य अपराध किया:
- एक पिता ने अपनी बड़ी बेटी का बलात्कार और हत्या की, जिसके लिए माँ की गवाही पर उसे उम्रकैद हुई।
- कुछ वर्षों बाद वह पैरोल पर बाहर आया और अपनी छोटी बेटी के सामने ही उसकी माँ (अपनी पत्नी) की हत्या कर दी।
- छोटी बेटी की गवाही पर उसे फिर मृत्युदंड मिला, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिर उम्रकैद में बदल दिया क्योंकि उसने छोटी बच्ची को नहीं मारा था।
संजीव कुमार मामला: याचिका की पृष्ठभूमि
- 2004-2014 का घटनाक्रम: संजीव कुमार को मई 2004 में मौत की सजा सुनाई गई थी। राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा दया याचिका खारिज होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2014 में कार्यकारी देरी (Executive Delays) के आधार पर उसकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया था।
- जेल का खराब आचरण: 20 वर्ष की वास्तविक सजा काटने के बाद संजीव ने हरियाणा की 2002 की छूट नीति (Remission Policy) के तहत समयपूर्व रिहाई मांगी। अगस्त 2024 में राज्य सरकार ने उसकी रिहाई खारिज कर दी। सरकार ने तर्क दिया कि 2008 में उसने जेल में सुरंग खोदकर भागने की कोशिश की थी और फरलो (Furlough) के दौरान लगभग 3 साल तक फरार रहा था।
- हाईकोर्ट बनाम राज्य सरकार: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में हरियाणा सरकार के इस फैसले को खारिज करते हुए कहा था कि 5 साल से पुराने खराब आचरण के आधार पर रिहाई नहीं रोकी जा सकती। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
नई दिल्ली: हत्या के जघन्य मामलों में मृत्युदंड (Death Penalty) के स्थान पर आजीवन कारावास देने की बढ़ती न्यायिक प्रवृत्ति, ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) सिद्धांत की वर्तमान सामाजिक प्रासंगिकता, पैरोल या छूट पर छूटे कैदियों द्वारा दोबारा खौफनाक अपराध करने के खतरे, तथा सजा में छूट (Remission) व समयपूर्व रिहाई (Premature Release) के विधिक मानकों पर सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण और स्पष्ट आत्म-परीक्षण (Judicial Self-Reflection) किया है।
बहु-हत्याकांड के दोषी संजीव कुमार की समयपूर्व रिहाई के संबंध में याचिका
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने बहु-हत्याकांड के दोषी संजीव कुमार की समयपूर्व रिहाई के संबंध में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली हरियाणा सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए यह गंभीर अवलोकन किया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने एक पुराने खौफनाक मामले का उदाहरण दिया जहां शीर्ष अदालत द्वारा फांसी की सजा उम्रकैद में बदलने के बाद दोषी ने पैरोल पर आकर गवाह की ही हत्या कर दी थी। दोनों पक्षों की विस्तृत बहस सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित (Reserved Verdict) रख लिया है। शीर्ष अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि हत्या के दोषियों के प्रति न्यायपालिका के “अत्यधिक क्षमाशील स्वभाव” (Forgiving Nature) ने कई बार उल्टे परिणाम दिए हैं और अब इस उदारता को कहीं न कहीं सीमित करने का समय आ गया है।
शीर्ष अदालत के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘दुर्लभ से दुर्लभतम सिद्धांत पर पुनर्विचार का समय—अब हत्याएं दुर्लभ नहीं रहीं’ न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने दंडशास्त्र (Penology) के बदलते सामाजिक संदर्भों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा: “समय बदल चुका है। पहले के दिनों में हत्या के मामलों में मृत्युदंड ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare Cases) के आधार पर दिया जाता था, क्योंकि उस समय हत्याएं वास्तव में दुर्लभ होती थीं। क्या आज भी स्थिति वैसी ही है? अब हत्या कोई दुर्लभ अपराध (Not a rare offence) नहीं रह गया है। इसलिए इस न्यायालय को इस बात का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि हत्या के मामलों में मृत्युदंड देते समय पारंपरिक न्यायिक संयम किस सीमा तक बरता जाए।”
2. ‘माफ करो, माफ करो… कहीं न कहीं तो रेखा खींचनी होगी’: पीठ ने न्यायपालिका द्वारा दिखाई जाने वाली अत्यधिक नरमी के परिणामों पर प्रहार करते हुए दर्ज किया:
“यह हमारे क्षमाशील स्वभाव (Forgiving Nature) के कारण ही है कि भारत आज इन समस्याओं का सामना कर रहा है। माफ करो, माफ करो, माफ करो—आपको कहीं न कहीं तो एक रेखा खींचनी ही होगी (You have to draw a line somewhere)। इसी अदालत ने एक ऐसे मामले में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला था, जहां एक पिता ने अपनी बड़ी बेटी से बलात्कार किया और उसकी हत्या कर दी। मां की गवाही पर वह उम्रकैद में जेल गया। कुछ वर्षों बाद वह पिता पैरोल पर बाहर आता है और अपनी छोटी बेटी के सामने उसकी मां की हत्या कर देता है। छोटी बेटी की गवाही पर उसे फांसी की सजा दी जाती है। और फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर उसकी फांसी को फिर उम्रकैद में बदल दिया कि उसने उस छोटी बच्ची की हत्या नहीं की थी! यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। इसीलिए हम कहते हैं कि हमारे इस क्षमाशील स्वभाव का कहीं न कहीं अंत होना ही चाहिए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: संजीव कुमार का 22 वर्षों का कानूनी सफर
- दोषसिद्धि और मृत्युदंड (2004–2007):
- संजीव कुमार को कई व्यक्तियों की नृशंस हत्या (Multiple Murders) के गंभीर अपराध में मई 2004 में निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड (सजा-ए-मौत) सुनाया गया था।
- यद्यपि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 2005 में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था, परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने 2007 में हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए उसकी फांसी की सजा बहाल कर दी थी।
- दया याचिका और प्रक्रियागत देरी पर कम्यूटेशन (2014):
- राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों द्वारा उसकी दया याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
- इसके बाद कुमार ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। जनवरी 2014 में, शत्रुघ्न चौहान फैसले के सिद्धांतों के तहत कार्यपालिका द्वारा दया याचिका के निपटारे में अत्यधिक देरी के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील (Commuted) कर दिया।
- हरियाणा सरकार द्वारा समयपूर्व रिहाई खारिज (अगस्त 2024):
- 20 वर्ष की वास्तविक कैद पूरी करने के बाद उसने हरियाणा की 2002 की छूट नीति (Remission Policy) के तहत रिहाई की मांग की।
- अगस्त 2024 में राज्य सरकार ने उसकी अर्जी खारिज कर दी और आदेश दिया कि वह शेष प्राकृतिक जीवन जेल में ही रहेगा। सरकार ने उसके खराब जेल आचरण को आधार बनाया—जिसमें 2008 में जेल में सुरंग खोदकर भागने की कोशिश और फरलो (Furlough) से लगभग तीन साल तक फरार रहना शामिल था। इसके अलावा यह भी दर्ज किया गया कि उसकी फांसी केवल प्रक्रियागत देरी पर कम्यूट हुई थी, गुण-दोष पर नहीं।
- हाईकोर्ट का रुख (दिसंबर 2025):
- पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2025 में राज्य के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि नीति के अनुसार रिहाई आवेदन से पूर्व केवल पिछले 5 वर्षों के आचरण पर ही विचार किया जा सकता है, पुराने कदाचार पर नहीं। हाईकोर्ट ने उसे अंतरिम जमानत देते हुए राज्य को पुनर्विचार का निर्देश दिया था।
- इसी आदेश के विरुद्ध हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ सिद्धांत (बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1980, संविधान पीठ):
- संविधान पीठ ने व्यवस्था दी थी कि मृत्युदंड केवल तभी दिया जाना चाहिए जब अपराध की क्रूरता अत्यधिक हो और अपराधी के सुधार की कोई संभावना न बची हो।
- हालांकि, हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट की पीठों में यह विमर्श गहराया है कि क्या यह सिद्धांत पीड़ितों और समाज के न्याय की कीमत पर अत्यधिक अभियुक्त-केंद्रित (Accused-centric) हो गया है।
- दया याचिका में देरी बनाम अपराध की गंभीरता (शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ, 2014):
- अनुच्छेद 21 के तहत अमानवीय देरी फांसी को उम्रकैद में बदलने का आधार बनती है, परंतु क्या ऐसे कैदी बाद में सामान्य कैदियों की भांति छूट (Remission) के भी स्वतः हकदार हो जाते हैं, यह एक जटिल विधिक प्रश्न बना हुआ है।
- सजा में छूट का अधिकार बनाम राज्य का विशेषाधिकार:
- हरियाणा राज्य बनाम लक्ष्मण (सुप्रीम कोर्ट) और संगीत बनाम हरियाणा राज्य में तय हुआ है कि छूट पाना कोई मौलिक अधिकार नहीं है; यह राज्य की नीति और कैदी के समग्र सुधार व समाज के लिए खतरे के मूल्यांकन पर निर्भर करता है। सुरंग खोदने और फरलो जंप करने जैसे कृत्य कैदी के सुधरने के दावे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: हरियाणा राज्य बनाम संजीव कुमार [आपराधिक अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू (खंडपीठ)
- तारीख: 8 अक्टूबर 2026
- संबद्ध प्रावधान एवं नीतियां:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302 (हत्या)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 432 एवं 433A (सजा में छूट व 14 वर्ष की न्यूनतम कैद)
- हरियाणा राज्य की समयपूर्व रिहाई नीति (Remission Policy, 2002)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 72 एवं अनुच्छेद 161
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980, संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही मृत्युदंड का सिद्धांत।’
- शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014, संविधान पीठ) — ‘कार्यपालिका द्वारा दया याचिका में अत्यधिक देरी के आधार पर मृत्युदंड का कम्यूटेशन।’
- स्वामी श्रद्धानंद बनाम कर्नाटक राज्य (2008, सुप्रीम कोर्ट) — ‘फांसी के विकल्प के रूप में बिना किसी छूट (Remission) के पूर्ण जीवन या 30-35 वर्ष के कठोर आजीवन कारावास की श्रेणी।’
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणियों के साथ मामले पर अपना निर्णय सुरक्षित (Verdict Reserved) रखा; फैसला आने पर छूट नीति और मृत्युदंड के बाद कम्यूटेशन मामलों में नए दिशानिर्देश तय होने की संभावना।
Death Sentence:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस शील नागू) |
| मामले की पृष्ठभूमि | दोषी संजीव कुमार की समयपूर्व रिहाई (Premature Release) याचिका |
| मूल दोषसिद्धि | मई 2004 में बहुचर्चित हत्याकांड (8 हत्याओं) में मृत्युदंड |
| कम्यूटेशन (लघूकरण) | दया याचिका में देरी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में मौत की सजा को उम्रकैद में बदला था। |
| ताज़ा स्थिति | सुप्रीम कोर्ट ने दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित (Reserved) रख लिया है। |

