Definition of Industry:क्या सरकारी समाज कल्याण योजनाएं ‘उद्योग’ (Industry) के दायरे में आती हैं?
9 जजों की संविधान पीठ ऐतिहासिक सुनवाई शुरू करेगी
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति विपूल एम पंचोली शामिल थे, ने बताया कि बड़ी पीठ 17 मार्च से इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी और संभावना है कि बहस अगले दिन तक पूरी कर ली जाएगी। इस दशकों पुराने कानूनी विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ऐतिहासिक सुनवाई शुरू करेगी।
यह है पूरा विवाद
औद्योगिक विवाद अधिनियम (Industrial Disputes Act), 1947 के तहत ‘उद्योग’ शब्द की सटीक परिभाषा क्या होनी चाहिए, इसे लेकर लंबे समय से कानूनी खींचतान चल रही है। सोमवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सुनवाई की तारीख तय करते हुए दोनों पक्षों को 28 फरवरी, 2026 तक अपनी लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल
- बेंगलुरु वाटर सप्लाई केस: क्या 1978 के मशहूर ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई बनाम ए. राजप्पा’ मामले में जस्टिस वी. कृष्णा अय्यर द्वारा तय किए गए मानक आज भी सही हैं?
- सरकारी योजनाएं: क्या सरकार द्वारा चलाई जाने वाली सोशल वेलफेयर स्कीमों और विभागों को ‘इंडस्ट्रियल एक्टिविटी’ माना जा सकता है?
- अधूरी कानूनी प्रक्रिया: 1982 के संशोधन अधिनियम (जो कई सालों से ठंडे बस्ते में है) का इस परिभाषा पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ता है?
20 साल से बड़े बेंच का इंतज़ार
- 2005: 5 जजों की बेंच ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे बड़ी बेंच को भेजने की सिफारिश की थी।
- 2017: तत्कालीन CJI टी.एस. ठाकुर की 7 जजों की बेंच ने इसे 9 जजों की पीठ के पास भेजने का फैसला किया।
- 2026: अब अंततः 17 और 18 मार्च को इस पर अंतिम बहस शुरू होगी।
- कोर्ट की टिप्पणी: “नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच बढ़ती मांगों और विधायिका की बेबसी को देखते हुए, इस परिभाषा को आज के संदर्भ में स्पष्ट करना बेहद जरूरी है।”
क्यों अहम है यह फैसला?
अगर ‘उद्योग’ की परिभाषा बदलती है, तो इसका सीधा असर लाखों कर्मचारियों और सरकारी संस्थानों पर पड़ेगा। इससे तय होगा कि किन संस्थानों पर लेबर लॉ (Labor Laws) लागू होंगे और किन पर नहीं।
इस फैसले की होगी समीक्षा
मामले का लेकर वर्ष 1975 में न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने महत्वपूर्ण निर्णय में ‘इंडस्ट्री’ की पहचान के लिए कानूनी कसौटी तय की थी। इस तरह सात न्यायाधीशों की एक ऐतिहासिक पीठ द्वारा लगभग पचास वर्ष पहले दिए गए फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा। उक्त निर्णय को अब दोबारा परखा जाएगा। खासतौर पर उस निर्णय के पैरा 140 से 144 में निर्धारित सिद्धांतों की वैधता और व्याख्या पर संविधान पीठ विचार करेगी।
‘ट्रिपल टेस्ट’ पर अहम सवाल किए जाएंगे
दरअसल, वर्ष 1975 के फैसले में ‘ट्रिपल टेस्ट’ का सिद्धांत अदालत ने विकसित किया था। इसमें कोई भी संस्था या प्रतिष्ठान तभी ‘इंडस्ट्री’ माना जाएगा जब वहां नियमित और व्यवस्थित गतिविधियां संचालित होती हों, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संगठित सहयोग मौजूद हो, वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण इस उद्देश्य से किया जा रहा हो कि मानव की जरूरतों या इच्छाओं की पूर्ति हो सके। इस व्यापक व्याख्या के कारण क्लब, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और अन्य सेवा आधारित संस्थाएं भी श्रम कानूनों के दायरे में आ गई थीं।
औद्योगिक विवाद संशोधन अधिनियम 1982 की जांच
संविधान पीठ पारित औद्योगिक विवाद संशोधन अधिनियम 1982 को जांचेगी जो कभी लागू नहीं किया गया। यह अधिनियम क्या ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा पर कोई कानूनी असर डालता है। इसके साथ ही औद्योगिक संबंध संहिता 2020 के प्रावधानों का मौजूदा व्याख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर भी विस्तार से विचार होगा।
सरकारी कल्याण योजनाओं को लागू करने वाली ‘इंडस्ट्री’ हैं
सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाएं या सार्वजनिक संस्थाओं की सामाजिक सेवाएं श्रम कानूनों के तहत औद्योगिक गतिविधि मानी जा सकती हैं। मामले का अहम पहलू यह भी है। अदालत तय करेगी कि राज्य के कौन से कार्य ऐसे हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(ज) के दायरे से बाहर रखे जा सकते हैं।
अदालत की तरफ से मामले की समयबद्ध सुनवाई की हो रही तैयारी
अदालत ने बताया कि इस मामले में पर्याप्त केस मैनेजमेंट पहले ही हो चुका है। पक्षकारों को 28 फरवरी 2026 तक अपने अतिरिक्त या अद्यतन लिखित तर्क दाखिल करने की अनुमति दी गई है। अदालत ने वकीलों से आपसी समन्वय बनाकर तय समयसीमा में बहस पूरी करने और रजिस्ट्री की प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का पालन करने को कहा है। दोनों पक्षों के नोडल वकीलों को याचिकाओं, दस्तावेजों और साक्ष्यों का नया संकलन तैयार करने का निर्देश दिया गया है। यह मामला श्रम कानूनों के भविष्य और सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं की कानूनी स्थिति को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ताओं को अपनी दलीलें रखने के लिए तीन घंटे का समय दिया गया है, जबकि प्रत्युत्तर के लिए एक अतिरिक्त घंटा निर्धारित किया गया है। संविधान पीठ का फैसला आने वाले समय में श्रमिकों के अधिकारों और संस्थानों की जवाबदेही को नई दिशा दे सकता है।

