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DNA Test for Adultery: पत्नी का अफेयर साबित करने के लिए बच्चे का DNA टेस्ट सही…मध्य प्रदेश HC का तलाक केस का यह फैसला पढ़ें

DNA Test for Adultery: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा, पत्नी का अफेयर साबित करने के लिए बच्चे का DNA टेस्ट सही है।

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन ने एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने पति द्वारा बच्चे का DNA टेस्ट कराने के आदेश को चुनौती दी थी। पति का दावा था कि बच्चा उसका जैविक (Biological) पुत्र नहीं है और पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध थे।

पारिवारिक अदालत (Family Court) के फैसले को सही ठहराया

हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए पारिवारिक अदालत (Family Court) के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसमें पत्नी पर “व्यभिचार” (Adultery) के आरोपों को साबित करने के लिए बच्चे के DNA टेस्ट की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मामला पितृत्व (Paternity) को नकारने का नहीं, बल्कि पत्नी के आचरण को साबित करने का हो, तो ऐसे आदेश दिए जा सकते हैं।

कोर्ट का मुख्य तर्क: मकसद पितृत्व नहीं, व्यभिचार है

  • हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कुछ बहुत ही बारीक और महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किए।
  • उद्देश्य: यह मामला ऐसा नहीं है जहाँ पति बच्चे के भरण-पोषण (Maintenance) से बचने के लिए पितृत्व को नकार रहा हो। यहां मुख्य आधार केवल पत्नी के खिलाफ ‘व्यभिचार’ के आरोपों को साबित करना है।
  • पर्याप्त आधार: कोर्ट ने पाया कि तलाक की अर्जी में पर्याप्त सबूत और दलीलें (Pleadings) मौजूद हैं, जो DNA टेस्ट के आदेश को न्यायसंगत बनाती हैं।

मामला क्या था? (The Background)

  • विवाद की शुरुआत: पति ने 2019 में ‘व्यभिचार’ के आधार पर तलाक की अर्जी दी थी।
  • समय का गणित (Non-access): पति का दावा था कि वह अक्टूबर 2015 में अपनी ड्यूटी से घर लौटा और उसके लौटने के महज 4 दिन के भीतर पत्नी ने अपनी गर्भावस्था (Pregnancy) की जानकारी दी।
  • मेडिकल तर्क: पति ने दलील दी कि मेडिकल साइंस के अनुसार, गर्भाधान (Conception) के 4 दिन के भीतर उसका पता चलना मुमकिन नहीं है; कम से कम 20 से 30 दिन का समय लगता है। बच्चा भी इस तारीख के 8 महीने के भीतर पैदा हो गया था।

राइट टू प्राइवेसी बनाम ‘सच का पता लगाना

  • पत्नी ने तर्क दिया था कि बच्चे का DNA टेस्ट कराना उसकी निजता (Privacy) और ‘बाल अधिकारों के कन्वेंशन’ का उल्लंघन है।
  • Presumption of Law: यदि पत्नी अभी भी DNA सैंपल देने से इनकार करती है, तो पारिवारिक अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(h) (या BSA 2023 के संबंधित प्रावधानों) के तहत यह मान सकती है कि रिपोर्ट पत्नी के खिलाफ ही आती (Adverse Inference)।
  • विवाद का इतिहास: यह पति द्वारा दायर तीसरी तलाक की अर्जी थी। पहली दो अर्जियों में पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक की बात कहकर कार्यवाही टाल दी थी, लेकिन बाद में वह कोर्ट में पेश नहीं हुई।

हाई कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)

  • अनिवार्यता: जहां बच्चे की ‘अवैधता’ (Illegitimacy) पर कोई घोषणा नहीं मांगी गई हो और केवल पत्नी के चरित्र का सवाल हो, वहां DNA टेस्ट एक उचित साक्ष्य हो सकता है।
  • देरी: चूंकि मामला 2021 से लंबित है और पत्नी का आचरण असहयोगात्मक रहा है, इसलिए पारिवारिक अदालत का फैसला सही है।

निष्कर्ष: साक्ष्य की शक्ति

यह फैसला दर्शाता है कि ‘निजता का अधिकार’ पूर्ण (Absolute) नहीं है। जब गंभीर आरोप जैसे ‘व्यभिचार’ को साबित करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध हों और परिस्थितियां संदिग्ध हों, तो अदालतें सत्य तक पहुंचने के लिए आधुनिक तकनीकों के उपयोग को प्राथमिकता दे सकती हैं।

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