Saturday, August 15, 2026
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Privacy Over Paternity: पत्नी का अफेयर साबित करने के लिए बच्चों का DNA टेस्ट नहीं करा सकते…बच्चे मोहरे नहीं हैं

Privacy Over Paternity: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा, कोई पति अपनी पत्नी के कथित “व्यभिचार” (Adultery) को साबित करने के लिए अपने बच्चों के DNA टेस्ट का सहारा नहीं ले सकता।

हाईकोर्ट के जस्टिस तर्लाद राजशेखर राव ने विजयनगरम की एक सिविल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए 59 वर्षीय पति की याचिका खारिज कर दी। पति ने अपनी तलाक की अर्जी के दौरान बच्चों के DNA फिंगरप्रिंटिंग की मांग की थी ताकि यह साबित हो सके कि वे उसकी संतान नहीं हैं। एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की निजता और उनके सामाजिक सम्मान की रक्षा करना किसी भी मुकदमे की निष्पक्षता से अधिक महत्वपूर्ण है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: बच्चे मोहरे नहीं हैं

  • अधिकार क्षेत्र: “भले ही यह मान लिया जाए कि पत्नी व्यभिचार कर रही है, फिर भी पति बच्चों को DNA टेस्ट के लिए भेजने का आवेदन नहीं कर सकता।”
  • पार्टी नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि बच्चे इस मुकदमे का हिस्सा नहीं हैं और न ही वे पिता से किसी भरण-पोषण (Maintenance) की मांग कर रहे हैं। ऐसे में उनकी गरिमा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।
  • साक्ष्य के अन्य तरीके: “यदि पति को पत्नी का व्यभिचार साबित करना है, तो उसे किसी अन्य तरीके से सबूत पेश करने होंगे। बच्चों का इस्तेमाल ‘शॉर्टकट’ के रूप में नहीं किया जा सकता।”

फेयर ट्रायल’ बनाम ‘निजता का अधिकार

  • पति के वकील ने दलील दी थी कि ‘सच’ जानने के लिए DNA टेस्ट एक “महत्वपूर्ण सबूत” है और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के लिए यह जरूरी है। हालांकि, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया।
  • मजबूत अनुमान (Presumption): ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ की धारा 112 के तहत, वैध विवाह के दौरान पैदा हुआ बच्चा वैध माना जाता है। इस अनुमान को केवल असाधारण स्थितियों में ही चुनौती दी जा सकती है।
  • सामाजिक नुकसान: सुप्रीम कोर्ट ने गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में कहा था कि बिना किसी मजबूत आधार के ब्लड टेस्ट का आदेश देना बच्चे की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।

मामला क्या था? (The Divorce Case)

  • तलाक का आधार: पति ने शुरुआत में ‘परित्याग’ (Desertion) के आधार पर तलाक मांगा था।
  • नया मोड़: सुनवाई के दौरान उसने ‘इंडियन एविडेंस एक्ट’ की धारा 45 के तहत एक आवेदन दिया कि उसके दो बच्चों का DNA टेस्ट कराया जाए ताकि साबित हो सके कि वे उसकी ‘वैध संतान’ नहीं हैं।

अन्य हाई कोर्ट्स के अलग रुख?

  • दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में अन्य अदालतों के कुछ अलग उदाहरण भी सामने आए।
  • मध्य प्रदेश HC: जनवरी में एक मामले में DNA टेस्ट की अनुमति दी थी जहां मकसद केवल व्यभिचार साबित करना था, पितृत्व (Paternity) को नकारना नहीं।
  • राजस्थान HC: फरवरी में एक “विरलतम” (Rarest of Rare) मामले में मैटरनिटी टेस्ट (Maternity Test) का आदेश दिया, जहां एक 93 वर्षीय मां ने अपनी ही बेटी को पहचानने से इनकार कर दिया था।

निष्कर्ष: बच्चे का हित सर्वोपरि

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला बच्चों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि पति-पत्नी की आपसी लड़ाई में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके भविष्य को ‘साक्ष्य’ (Evidence) के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

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