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ENVIRONMENTAL CLEARANCE: पर्यावरण नियमों को प्रदूषण करो और भुगतान करो में नहीं बदला सकते…यह रही सुप्रीम टिप्पणी

ENVIRONMENTAL CLEARANCE: सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण नियमों के उल्लंघन और पूर्वव्यापी (Retrospective) मंजूरी को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जो 2025 के ‘वनशक्ति’ फैसले की समीक्षा से जुड़ी हैं। अदालत को बताया गया कि ‘प्रदूषक भुगतान’ (Polluter Pays) के सिद्धांत का दुरुपयोग ‘प्रदूषण करो और जुर्माना भरो’ के रूप में नहीं होना चाहिए।

याचिकाकर्ता की दलील: मंजूरी महज औपचारिकता नहीं

  • याचिकाकर्ता की ओर से वकील सृष्टि अग्निहोत्री ने पूर्वव्यापी मंजूरी (Ex Post Facto Clearance) का कड़ा विरोध किया।
  • अनिवार्य सुरक्षा: उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ‘पूर्व’ (Prior) पर्यावरणीय मंजूरी लेना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस सुरक्षा उपाय है।
  • दिखावा: एक बार प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद विकल्पों का विश्लेषण केवल ‘कागजी कसरत’ रह जाता है क्योंकि नुकसान पहले ही हो चुका होता है।
  • जोखिम: यदि कोई प्रोजेक्ट भूकंपीय क्षेत्र या भू-क्षरण वाले इलाके में बना है, तो जुर्माना लेकर उसे नियमित करना सार्वजनिक धन की बर्बादी है।
तारीखघटनाक्रम
16 मई, 2025सुप्रीम कोर्ट का ‘वनशक्ति’ फैसला: बिना पूर्व मंजूरी वाले प्रोजेक्ट्स को ‘पूर्वव्यापी मंजूरी’ देने पर रोक लगाई।
18 नवंबर, 2025तीन जजों की बेंच ने 2:1 के बहुमत से अपने ही फैसले पर रोक लगाई। तर्क दिया कि ₹20,000 करोड़ का सार्वजनिक धन बर्बाद हो जाएगा।
मार्च, 2026CJI की अगुवाई वाली नई पीठ ने मामले की नए सिरे से अंतिम सुनवाई शुरू की।

अदालत की वैश्विक टिप्पणी: अंतरराष्ट्रीय कानून से बच रहे हैं देश

जब वकील ने रियो घोषणा और पेरिस सिद्धांतों का हवाला दिया, तो पीठ ने वैश्विक कड़वी सच्चाई को सामने रखा। रियो घोषणा और पेरिस सिद्धांत जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून आज बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं क्योंकि राष्ट्र-राज्य (Nation States) उनसे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका और चीन जैसे देश इन घोषणाओं के प्रति उदासीन हैं और शायद ही कुछ करते हैं।

सरकार का बचाव: यह नियमों को आसान बनाना नहीं, कठिन बनाना है

  • अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने सरकार के कार्यालय ज्ञापन (OM) का बचाव किया।
  • कठोर प्रक्रिया: उल्लंघन करने वाली इकाइयों को पहले बंद करना होगा, फिर विशेषज्ञ समिति (EAC) द्वारा जांच होगी, भारी जुर्माना देना होगा और नुकसान की भरपाई (Remediation Plan) की योजना देनी होगी।
  • विस्तार: यह व्यवस्था नियमों को कमजोर नहीं कर रही, बल्कि उल्लंघन करने वालों के लिए प्रक्रिया को अधिक महंगा और कठिन बना रही है।

जजों की चिंता: कानून का शासन कहाँ है?

  • जस्टिस जोयमाल्या बागची ने प्रवर्तन (Enforcement) पर गंभीर सवाल उठाए।
  • सरकार की जिम्मेदारी: राज्य और केंद्र सरकारों को कानून के शासन का संरक्षक होना चाहिए। सरकार यह दावा कैसे कर सकती है कि उसे बिना मंजूरी के चल रहे प्रोजेक्ट्स की जानकारी नहीं थी?
  • नियमों का क्षरण: उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पूर्व अनुमति की आवश्यकता को इस तरह नियमित किया गया, तो यह पर्यावरण नियमों के पालन की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त कर देगा।
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