HOMELESS PEOPLE: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मानसिक और सामाजिक रूप से विकलांग (साइकोसोशल डिसएबिलिटी) से जूझ रहे बेघर लोगों का पुनर्वास एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है।
मामले को बेहद गंभीरता से लें: कोर्ट
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि इस मुद्दे पर विचार-विमर्श चल रहा है और संबंधित विभागों के बीच बैठकें हो रही हैं। सरकार ने कोर्ट से समय मांगा ताकि अब तक हुई प्रगति की जानकारी दी जा सके। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मामले को बेहद गंभीरता से ले और जल्द से जल्द ठोस कदम उठाए। कोर्ट ने कहा, आपको इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा और जितना जल्दी हो सके, उतना बेहतर होगा।
पुनर्वास नीति बनाने की मांग
यह याचिका वकील गौरव कुमार बंसल ने दायर की थी। उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि बेघर और मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए एक स्पष्ट और प्रभावी पुनर्वास नीति बनाई जाए और उसे लागू किया जाए। कोर्ट ने अप्रैल में इस याचिका पर केंद्र और अन्य पक्षों से जवाब मांगा था। बंसल ने कहा कि बेघर लोग “फुटबॉल” बनकर रह गए हैं, जिन्हें कोई भी विभाग एक-दूसरे पर टाल देता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की स्थिति और भी खराब है और पुलिस की ओर से भी इस मामले में संवेदनशीलता की कमी है।
कानून तो हैं, लेकिन अमल कहां?
सरकार की ओर से जब मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 का हवाला दिया गया तो कोर्ट ने कहा, कानून तो हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन और अनुपालन कहां है? कोर्ट ने कहा कि वह सरकार की अगली रिपोर्ट का इंतजार करेगा और फिर इस मामले की निगरानी करेगा ताकि इसे तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जा सके। अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
याचिका में दावा
- याचिका में मांग की गई है कि पुलिस और स्वास्थ्य विभाग जैसे प्रमुख विभागों के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाए जाएं ताकि बेघर मानसिक रूप से बीमार लोगों के साथ मानवीय और प्रभावी तरीके से व्यवहार हो सके।
- याचिका में कहा गया है कि इन लोगों को उचित देखभाल देने के बजाय उपेक्षा, सामाजिक बहिष्कार और शारीरिक व यौन शोषण का शिकार बनाया जाता है।
- याचिका में यह भी कहा गया है कि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 और नेशनल मेंटल हेल्थ पॉलिसी, 2014 जैसे कानून और नीतियां होने के बावजूद सरकारें इनका सही तरीके से पालन नहीं कर रही हैं।
- याचिकाकर्ता ने कहा कि बेघर और मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए कोई ठोस राष्ट्रीय नीति नहीं होने के कारण हजारों लोग इलाज, आश्रय और सामाजिक अधिकारों से वंचित हैं।

