Monday, August 10, 2026
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SOCIAL MEDIA-POLICE: सोशल मीडिया पर पुलिस का वीडियो डालना फेयर ट्रायल के लिए खतरा…कहा-हर मोबाइल वाला अब मीडिया है

SOCIAL MEDIA-POLICE: सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर पुलिस द्वारा आरोपियों के वीडियो और तस्वीरें अपलोड करने के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता जताई है।

अदालत ने चेतावनी दी है कि इस तरह की गतिविधियां निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं और जनता के मन में आरोपी के प्रति पहले से ही पूर्वाग्रह (Bias) भर देती हैं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

हथकड़ी और परेड: गरिमा पर चोट

  • याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पुलिस के सोशल मीडिया व्यवहार पर सवाल उठाए।
  • दोषी जैसा व्यवहार: उन्होंने बताया कि आजकल पुलिस आरोपियों को हथकड़ी लगाकर, रस्सियों से बांधकर, परेड कराते हुए या घुटनों के बल बैठाकर उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करती है।
  • पूर्वाग्रह: यह न केवल व्यक्तिगत गरिमा का अपमान है, बल्कि अदालत के फैसले से पहले ही जनता की नजर में उसे अपराधी बना देता है।
  • डिजिटल मीडिया: शंकरनारायणन ने कहा कि आज हर व्यक्ति जिसके पास मोबाइल फोन है, वह खुद को ‘मीडिया’ समझने लगा है।

अदालत की सख्त टिप्पणियां: अनियंत्रित सोशल मीडिया

  • जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे।
  • पुलिस बनाम सोशल मीडिया: “पुलिस को तो SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन सोशल मीडिया और जनता का क्या? टीवी चैनल फिर भी कुछ हद तक संयमित हैं, भले ही उनके विचारों से असहमति हो।”
  • जांच एजेंसी की भूमिका: अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी न तो पीड़ित की तरफ से होती है और न ही आरोपी की तरफ से; उसका काम केवल सच का पता लगाना है।
  • मीडिया ट्रायल: कोर्ट ने चिंता जताई कि जब मीडिया (विशेषकर सोशल मीडिया) किसी मामले में अपनी ‘नैरेटिव’ बुनने लगता है, तो वह कानून के शासन (Rule of Law) को पूरी तरह से नष्ट कर देता है।

“ब्लैकमेलर और डिजिटल अरेस्ट”

  • सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और CJI सूर्यकांत ने सोशल मीडिया के नकारात्मक पक्ष पर तीखी टिप्पणी की।
  • तुषार मेहता: “सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म हैं जो केवल वर्चुअल रूप से मौजूद हैं और ब्लैकमेलरों की तरह काम करते हैं। ‘ब्लैकमेलिंग’ तो उनके लिए बहुत छोटा शब्द है।”
  • CJI सूर्यकांत: “यह डिजिटल अरेस्ट का ही एक अलग पहलू है। छोटे शहरों में लोग अपनी गाड़ियों पर ‘मीडिया’ का स्टिकर लगाकर धौंस जमाते हैं और गलत इरादों को अंजाम देते हैं।”

व्यापक नीति की जरूरत

कोर्ट ने सुझाव दिया कि चूंकि यह मामला केवल पुलिस तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पारंपरिक और सोशल मीडिया भी शामिल है, इसलिए इस पर एक व्यापक तंत्र (Comprehensive Mechanism) की जरूरत है। अदालत के सुझाव पर याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली है। वे इसे अप्रैल के बाद दोबारा अधिक व्यापक दायरे के साथ दाखिल करेंगे, जब पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए नई गाइडलाइंस (SOP) लागू हो चुकी होंगी।

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