Wednesday, October 28, 2026
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Lack of accused’s postal address: साइबर अपराधी गुमनाम हो सकते हैं, पता न होने पर शिकायत रद्द नहीं होगी…मुकदमा चलेगा

Lack of accused’s postal address: केरल हाईकोर्ट के जस्टिस सी.एस. डायस ने कहा, मजिस्ट्रेट किसी शिकायत को केवल इसलिए वापस नहीं कर सकते क्योंकि शिकायतकर्ता के पास आरोपी का घर का पता नहीं है।

केरल हाई कोर्ट ने अनघ बनाम केरल राज्य मामले में फैसला सुनाते हुए साइबर अपराधों और डिजिटल युग की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल डाक पता (Postal Address) न होने के आधार पर किसी निजी शिकायत को खारिज या वापस नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब मामला सोशल मीडिया या इंटरनेट से जुड़ा हो। यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए बड़ी राहत है जो ऑनलाइन प्रताड़ना का शिकार होते हैं लेकिन आरोपी का घर का पता न होने के कारण कानूनी कार्रवाई नहीं कर पाते थे। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अपराधी अब ‘गुमनामी’ की आड़ में छिपकर सजा से नहीं बच सकते।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • डिजिटल युग की सच्चाई: आज के समय में साइबर बुलिंग, मानहानि और ऑनलाइन पीछा (Stalking) जैसे अपराध अक्सर फर्जी आईडी या गुमनाम पहचान के जरिए किए जाते हैं। पीड़ितों के पास अक्सर केवल फोन नंबर, ईमेल या सोशल मीडिया प्रोफाइल ही होता है।
  • कानून क्या कहता है? ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) की धारा 2(1)(h) के अनुसार, शिकायत ‘ज्ञात या अज्ञात’ (known or unknown) व्यक्ति के खिलाफ की जा सकती है। इसलिए, पता होना शिकायत दर्ज करने की अनिवार्य शर्त नहीं है।
  • प्रक्रिया बनाम न्याय: कोर्ट ने कहा, “केवल डाक पते के अभाव में शिकायत वापस करना, प्रक्रियात्मक कठोरता के सामने न्याय को गौण करना है।”

मामला क्या था?

  • याचिकाकर्ता (अनघ) ने एक महिला के खिलाफ निजी शिकायत दर्ज की थी, जिसने सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर उनके खिलाफ अपमानजनक बातें फैलाई थीं।
  • मजिस्ट्रेट का रुख: मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए शिकायत वापस कर दी कि आरोपी का डाक पता नहीं दिया गया है।
  • हाई कोर्ट का हस्तक्षेप: हाई कोर्ट ने इस आदेश को “दोषपूर्ण और कानूनन अस्थिर” बताते हुए रद्द कर दिया।

कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश

  • डिजिटल समन: कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह शिकायत स्वीकार करें और आरोपी को उसके इलेक्ट्रॉनिक पते (सोशल मीडिया/ईमेल) के जरिए नोटिस जारी करें।
  • पुलिस की भूमिका: यदि पता ज्ञात नहीं है, तो मजिस्ट्रेट के पास पुलिस को जांच के निर्देश देने और आरोपी की पहचान स्थापित करने की शक्ति है।
  • नियमों में बदलाव: हाई कोर्ट ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वे ‘क्रिमिनल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस’ में संशोधन पर विचार करें, ताकि साइबर अपराधों के मामलों में ‘इलेक्ट्रॉनिक समन’ को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
  • मध्यस्थों (Intermediaries) की जिम्मेदारी: IT एक्ट के तहत फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म यूजर डेटा और लॉग्स सुरक्षित रखने और कानूनी मांग पर उन्हें साझा करने के लिए बाध्य हैं, जिससे अपराधियों को ट्रैक किया जा सके।
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