LN Mishra Case:2 जनवरी 1975 को बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर हुए बम धमाके ने पूरे देश को हिला दिया था।
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रतिभा एम सिंह व मधु जैन की अदालत में बिहार के चर्चित केस तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हादसे में जान गंवाने के मामले में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद होनेवाली सुनवाई में कोर्ट ने सीबीआई से स्पष्ट रूप से फटकार लगाते हुए कहा कि उनका स्टैंड क्या है—क्या वे दोषियों की सजा का समर्थन करते हैं या दोबारा जांच का? दरअसल, इस घटना में तत्कालीन रेल मंत्री श्री ललित नारायण मिश्रा सहित तीन लोगों की जान गई थी। अब, 2026 में, दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले में दोषियों की अपील और पीड़ित परिवार की नई मांगों पर सुनवाई कर रहा है। यह केस भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे लंबे चलने वाले मुकदमों में से एक है। 50 साल बाद पीड़ित परिवार का ही यह कहना कि “जांच गलत दिशा में हुई थी”, व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मामले का घटनाक्रम (Timeline)
- 2 जनवरी, 1975: समस्तीपुर में धमाका, रेल मंत्री एल.एन. मिश्रा का निधन।
- फरवरी 1975: CBI ने जांच संभाली; दो व्यक्ति (अरुण कुमार मिश्रा और अरुण कुमार ठाकुर) गिरफ्तार हुए।
-जुलाई-अगस्त 1975: जांच ने नया मोड़ लिया। ‘आनंद मार्ग’ संप्रदाय के लोगों को आरोपी बनाया गया। पहले गिरफ्तार दोनों व्यक्ति रिहा कर दिए गए।
-1975-1977: देश में नेशनल इमरजेंसी लागू रही। - 1978: इमरजेंसी के बाद बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने गुप्त जांच कराई। ‘एस.बी. सहाय रिपोर्ट’ (24 अक्टूबर 1978) तैयार हुई, जो अब इस केस का टर्निंग पॉइंट बनी है।
- 8 दिसंबर, 2014: दिल्ली की निचली अदालत ने घटना के 40 साल बाद 5 लोगों को दोषी ठहराया।
हाई कोर्ट में 24 फरवरी, 2026) के बड़े निर्देश
- पीड़ित परिवार का चौंकाने वाला रुख
आमतौर पर पीड़ित परिवार दोषियों की सजा बरकरार रखने की मांग करता है, लेकिन यहाँ एल.एन. मिश्रा के पोते वैभव मिश्रा (एडवोकेट) ने अलग मांग की है। उनका कहना है कि मूल जांच को जानबूझकर भटकाया गया था। असली साजिशकर्ताओं (जैसे तत्कालीन MLC राम विलास झा) को क्लीन चिट दे दी गई। उन्होंने मांग किया कि इस पूरे मामले की फिर से जांच (Re-investigation) होनी चाहिए।
- दोषियों (Appellants) की दलील
सजा पाए आनंद मार्गियों का प्रतिनिधित्व कर रही वकील सुश्री गुलाटी ने भी ‘फिर से जांच’ की मांग का समर्थन किया है। उनका दावा है कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है।
- CBI को कड़ी फटकार और निर्देश
- कोर्ट ने CBI के वकील से पूछा कि उनका स्टैंड क्या है—क्या वे दोषियों की सजा का समर्थन करते हैं या दोबारा जांच का?
- निर्देश: CBI के जॉइंट डायरेक्टर रैंक के अधिकारी को एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
- मौखिक निर्देशों के बजाय अब CBI को लिखित हलफनामा देना होगा।
कोर्ट का सख्त आदेश
- जस्टिस ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार इस मामले में अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब कोई भी पक्ष सुनवाई टालने की गुजारिश नहीं कर सकेगा।
- दिल्ली हाई कोर्ट के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 50 साल पुराने इस मामले में क्या ‘री-इन्वेस्टिगेशन’ (दोबारा जांच) व्यावहारिक है?
- CBI की दुविधा: यदि CBI दोबारा जांच के लिए तैयार होती है, तो उसे अपनी ही पिछली 40 साल की मेहनत और निचली अदालत के ‘दोषसिद्धि’ (Conviction) के फैसले को गलत मानना पड़ेगा।
- न्याय की उम्मीद: अगर हाई कोर्ट ‘री-इन्वेस्टिगेशन’ का आदेश देता है, तो यह भारतीय कानूनी इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण होगा जहाँ सजा पाने के बाद भी केस को शून्य से शुरू किया जाएगा।
जानिए एसबी सहाय की अहम रिपोर्ट
निश्चित रूप से, एस.बी. सहाय रिपोर्ट (24 अक्टूबर, 1978) इस पूरे मामले की सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण कड़ी है। जब 1977 में इमरजेंसी खत्म हुई और बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार आई, तब इस हत्याकांड की ‘सीक्रेट इन्क्वायरी’ के आदेश दिए गए थे। बिहार के तत्कालीन पुलिस उप-महानिरीक्षक (सतर्कता) एस.बी. सहाय द्वारा तैयार इस रिपोर्ट के कुछ ऐसे बिंदु हैं, जो वर्तमान जांच (CBI) पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
- जांच की दिशा ‘जानबूझकर’ मोड़ना
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि शुरुआती जांच सही दिशा में जा रही थी, जब बिहार सीआईडी (CID) ने स्थानीय अपराधियों और राजनीतिक रंजिश की बात कही थी। लेकिन जैसे ही केस CBI को मिला, जांच का रुख पूरी तरह से ‘आनंद मार्गियों’ की तरफ मोड़ दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, यह एक “सोची-समझी राजनीतिक साजिश” थी।
- असली साजिशकर्ताओं को ‘क्लीन चिट’
- सहाय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हत्या की योजना में कुछ ऐसे रसूखदार लोग शामिल थे, जिन्हें कभी आरोपी ही नहीं बनाया गया।
- राम विलास झा (MLC): रिपोर्ट में इनके नाम का उल्लेख है। आरोप है कि स्थानीय स्तर पर उन्होंने ही इस घटना को अंजाम देने वालों की मदद की थी।
- राजनीतिक लाभ: रिपोर्ट संकेत देती है कि उस समय की सत्ता के कुछ लोग एल.एन. मिश्रा के बढ़ते कद से असुरक्षित महसूस कर रहे थे और उन्हें रास्ते से हटाना चाहते थे।
- गवाहों पर दबाव और ‘प्लांटेड’ थ्योरी
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिन दो व्यक्तियों (विक्रम और मदन मोहन) के बयानों के आधार पर आनंद मार्गियों को गिरफ्तार किया गया, वे बयान दबाव में दिलवाए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, आनंद मार्गियों को बलि का बकरा (Scapegoat) बनाया गया ताकि असली अपराधी बच सकें।
IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
JUSTICE PRATHIBA M.SINGH
JUSTICE MADHUJAINCRL.A. 91/2015&CRL.M.A. 32334/2025
SANTOSHANANDAVADHUT@GHANSHYAMPRASAD&
ANR …..Appellants versus CENTRALBUREAUOFINVESTIGATION
AND
CRL.A. 130/2015&CRL.M.A. 15461/2021
SUDEVANANDAVADHOOT@RAMCHANDRA@BHARAT@
DOCTOR@MISRILALYADAV …..Appellant versus
CENTRALBUREAUOFINVESTIGATION(CBI)

