Saturday, September 19, 2026
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Lok Adalat Verdict: एक बार ‘हां’ कह दी, तो फिर पीछे नहीं हट सकते…अदालत को खिलौना न समझें, पढ़ें अदालत की यह टिप्पणी

Lok Adalat Verdict: जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट के जस्टिस वसीम सादिक नरगल की बेंच ने लोक अदालत के महत्व और उसकी शुचिता पर एक बड़ा फैसला सुनाया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष अपनी सहमति से लोक अदालत में समझौता करता है, तो बाद में वह केवल अपनी “अक्षमता” या “असुविधा” के आधार पर उस फैसले को चुनौती नहीं दे सकता। यह मामला चेक बाउंस (Cheque Dishonour) के एक विवाद से जुड़ा था, जहाँ याचिकाकर्ता ने लोक अदालत में पैसे चुकाने का वादा किया था, लेकिन बाद में अपनी बात से पलट गया।

कोर्ट का मुख्य कानूनी सिद्धांत (Estoppel under Law)

  • अदालत ने ‘विबंधन के सिद्धांत’ (Doctrine of Estoppel) और लोक अदालत की शक्तियों पर निम्नलिखित व्यवस्था दी।
  • अंतिम और बाध्यकारी: लोक अदालत द्वारा पारित ‘अवॉर्ड’ (Award) को सिविल कोर्ट की डिक्री के समान माना जाता है। यह अंतिम और निष्पादन योग्य (Executable) होता है।
  • चुनौती के सीमित आधार: लोक अदालत के फैसले को केवल धोखाधड़ी (Fraud), जबरदस्ती (Coercion), सहमति का अभाव या अधिकार क्षेत्र की गलती जैसे गंभीर आधारों पर ही चुनौती दी जा सकती है।
  • असुविधा कोई आधार नहीं: जस्टिस नरगल ने कहा, “केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता अब समझौते का पालन करने में असमर्थ है या उसे असुविधा हो रही है, वह कानूनन अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।”

मामला क्या था? (Background: Section 138 NI Act)

  • विवाद: याचिकाकर्ता ने दो चेक (प्रत्येक ₹50,000) जारी किए थे जो बैंक से बाउंस हो गए। इसके बाद ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट’ के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई।
  • समझौता: मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज होने के बाद, मामला लोक अदालत में गया। 8 मार्च, 2025 को लोक अदालत में याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से ₹3.8 लाख का भुगतान मार्च के अंत तक करने का वचन दिया।
  • पलटना: बाद में याचिकाकर्ता ने इस ‘अवॉर्ड’ को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसे कोर्ट ने “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” माना।

मिसचीवस टेंडेंसी (बढ़ती प्रवृत्ति) पर कोर्ट की चिंता

  • अदालत ने इस मामले के माध्यम से समाज में बढ़ रही एक गलत परिपाटी पर भी टिप्पणी की।
  • समय की बर्बादी: कोर्ट ने नोट किया कि आजकल लोग लोक अदालत में तो सहमति दे देते हैं, लेकिन बाद में रिट याचिकाएं (Writ Petitions) दायर कर अदालतों का कीमती समय बर्बाद करते हैं।
  • लोक अदालत का उद्देश्य: लोक अदालत का गठन विवादों के त्वरित, सौहार्दपूर्ण और लागत प्रभावी समाधान के लिए किया गया है। बाद में मुकरने से इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतजम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट (जस्टिस वसीम सादिक नरगल)।
कानूनी स्थितिलोक अदालत अवॉर्ड = सिविल कोर्ट डिक्री।
मुख्य संदेशअपनी मर्जी से किए गए समझौते से पीछे हटना कानूनन मना है।
परिणामयाचिका खारिज; लोक अदालत का फैसला बरकरार।

सहमति की पवित्रता

हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो कानूनी कार्यवाही को टालने के लिए लोक अदालत का इस्तेमाल ‘स्टॉप-गैप’ अरेंजमेंट के रूप में करते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एक बार जब आपने समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए और वह न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया, तो वह पत्थर की लकीर बन जाता है। इसे बदलना तभी संभव है जब आप यह साबित कर सकें कि आपसे “बंदूक की नोक” पर या धोखे से हस्ताक्षर कराए गए थे।

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