Lover’s marital life: जम्मू एंड कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के जस्टिस मोक्ष खजुरिया काजमी ने विवाह के लिए सुरक्षा मांगनेवाली याचिका की सुनवाई में महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया।
हाईकोर्ट ने ‘रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल’ को आदेश दिया है कि भविष्य में इस तरह की सभी याचिकाओं के साथ यह विशिष्ट शपथ पत्र अनिवार्य रूप से संलग्न होना चाहिए। जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख उच्च न्यायालय ने उन विवाहित जोड़ों के लिए एक नया और अनिवार्य नियम लागू किया है जो अपनी सुरक्षा (Protection) के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। अब ऐसे जोड़ों को एक शपथ पत्र (Affidavit) देना होगा जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि क्या यह उनका पहला विवाह है या नहीं।
कोर्ट के निर्देश की मुख्य बातें
- शपथ पत्र की अनिवार्यता: अब जोड़ों को यह घोषित करना होगा कि जिस विवाह के लिए वे सुरक्षा मांग रहे हैं, वह उनका पहला विवाह है या नहीं।
- पारदर्शिता: इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोर्ट के पास याचिकाकर्ताओं की वैवाहिक स्थिति (Marital Status) के बारे में पूरी जानकारी हो, जिससे कानूनी जटिलताओं (जैसे द्विविवाह या बिगैमी) से बचा जा सके।
- सुरक्षा का आदेश: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा देने का मतलब यह नहीं है कि अदालत उस विवाह की वैधता (Validity) को स्वीकार कर रही है। यदि विवाह की वैधता पर कोई कानूनी विवाद होता है, तो वह अलग से तय किया जाएगा।
मामला क्या था?
- यह निर्देश एक ऐसे जोड़े की याचिका पर आया जिन्होंने 7 फरवरी, 2026 को अपनी मर्जी से शादी की थी।
- खतरा: जोड़े का दावा था कि उनके परिवार इस शादी के खिलाफ हैं और उन्हें अपनी जान-माल का खतरा है। उन्हें डर था कि पुलिस उनके परिवार के दबाव में उन्हें गिरफ्तार कर सकती है।
- कोर्ट का रुख: कोर्ट ने पाया कि दोनों बालिग हैं और उन्होंने स्वेच्छा से विवाह किया है। ‘लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ और ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ जैसे प्रसिद्ध सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जोड़े के वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करें।
इस निर्देश का महत्व
- अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाकर दूसरी शादी कर लेते हैं और फिर कोर्ट से सुरक्षा की मांग करते हैं। नया नियम ऐसे मामलों में स्पष्टता लाएगा।
- अधिकार: यह निर्देश अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार और वैवाहिक कानूनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।
- प्रक्रिया: अब वकीलों को ऐसी याचिकाएं दायर करते समय इस नए शपथ पत्र का विशेष ध्यान रखना होगा।
अगले कदम और निष्कर्ष
हाई कोर्ट के इस निर्देश से अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में “प्रोटेक्शन पिटीशन” की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो जाएगी। सुरक्षा तो मिलेगी, लेकिन केवल तथ्यों के पूर्ण खुलासे के साथ।
जानिएं भारत में प्रेम विवाह करनेवाले जोड़ों के सुरक्षा कवच वाले फैसले
सुप्रीम कोर्ट के ‘लता सिंह’ (2006) और ‘शक्ति वाहिनी’ (2018) वाले फैसले भारत में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह हैं। इन फैसलों में कोर्ट ने ‘ऑनर किलिंग’ (Honour Killing) और परिवारों के अवैध हस्तक्षेप के खिलाफ बहुत सख्त दिशा-निर्देश दिए हैं।
- लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006)
- यह मामला एक अंतर-जातीय विवाह (Inter-caste Marriage) से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने इसमें बहुत स्पष्ट बातें कहीं।
- बालिग की मर्जी: यदि कोई लड़का (21 वर्ष+) और लड़की (18 वर्ष+) बालिग हैं, तो वे अपनी पसंद से शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं। माता-पिता या समाज उन्हें रोक नहीं सकता।
- हिंसा का कोई स्थान नहीं: कोर्ट ने कहा कि अगर परिवार को शादी पसंद नहीं है, तो वे अधिकतम ‘सामाजिक संबंध’ तोड़ सकते हैं, लेकिन वे जोड़े को डरा-धमका नहीं सकते और न ही हिंसा कर सकते हैं।
- प्रशासन की जिम्मेदारी: कोर्ट ने आदेश दिया कि पूरे देश में प्रशासन और पुलिस यह सुनिश्चित करें कि ऐसे जोड़ों को परेशान न किया जाए और उनके खिलाफ कोई झूठी FIR दर्ज न हो।
- शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018)
- यह फैसला मुख्य रूप से ‘खाप पंचायतों’ और ‘सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याओं’ (Honour Killings) के खिलाफ था।
- जीवन साथी चुनने का अधिकार: कोर्ट ने घोषित किया कि अपनी पसंद का जीवन साथी चुनना अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का अभिन्न हिस्सा है।
- सम्मान बनाम स्वतंत्रता: कोर्ट की प्रसिद्ध टिप्पणी थी— “जब दो बालिग आपसी सहमति से शादी करते हैं, तो परिवार या समाज का ‘सम्मान’ उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आड़े नहीं आ सकता।”
- निवारक उपाय (Preventive Measures): कोर्ट ने सरकारों को निर्देश दिए कि हर जिले में ‘स्पेशल सेल’ बनाई जाए जहाँ खतरे का सामना कर रहे जोड़े शिकायत कर सकें।
- सुरक्षित घर (Safe Houses): जोड़ों के ठहरने के लिए सुरक्षित घरों की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया गया।
- ‘ऑनर किलिंग’ पर सख्त रुख
इन फैसलों में कोर्ट ने साफ किया कि ‘सम्मान’ के नाम पर की जाने वाली हिंसा पूरी तरह से असंवैधानिक और अवैध है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि ऐसी हत्याओं के मामलों में शामिल लोगों को कड़ी से कड़ी सजा (मृत्युदंड तक) दी जानी चाहिए।
निष्कर्ष और वर्तमान स्थिति
यही कारण है कि जब भी कोई जोड़ा हाई कोर्ट जाता है, तो कोर्ट इन्हीं फैसलों का आधार लेकर पुलिस को सुरक्षा देने का आदेश देता है। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का ताजा निर्देश (शपथ पत्र वाला) इन्हीं अधिकारों का दुरुपयोग रोकने के लिए है, ताकि सुरक्षा का लाभ केवल उन्हीं को मिले जो कानूनन सही हैं।
HIGH COURT OF JAMMU & KASHMIR AND LADAKH AT SRINAGAR
CORAM: HON’BLE MS. JUSTICE MOKSHA KHAJURIA KAZMI, JUDGE
WP(C)/344/2026
Mr. Syed Tajamul, Advocate
Vs.
UNION TERRITORY OF J AND K AND OTHERS

