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Matrimonial law: दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक मामलों की सुनवाई कर रहे एक फैमिली कोर्ट जज को अनिवार्य और व्यापक ट्रेनिंग प्रोग्राम से गुजरने का निर्देश दिया है।
बिना कोई सबूत रिकॉर्ड किए एक महिला को तलाक की डिक्री दे दी
कोर्ट ने पाया कि जज ने बिना कोई सबूत रिकॉर्ड किए एक महिला को तलाक की डिक्री दे दी और ऐसा करते समय एक गैर-मौजूद कानूनी प्रावधान पर भरोसा किया। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने पति द्वारा चुनौती दिए गए तलाक के आदेश को रद्द करते हुए मामले को फैमिली कोर्ट को नए सिरे से सुनवाई (de novo adjudication) के लिए वापस भेज दिया।
यह है मामला
यह मामला तब फैमिली कोर्ट पहुंचा था जब सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में शादी करने वाले इस जोड़े के वैवाहिक मामलों को महिला की याचिका पर पश्चिम बंगाल की एक अदालत से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया था। महिला वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ हल में लेक्चरर है।
केस में कई बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की गई: कोर्ट
उच्च न्यायालय ने पाया कि संबंधित जज ने न केवल तलाक देते समय गंभीर प्रक्रियात्मक और कानूनी त्रुटियाँ कीं, बल्कि कई बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की। उच्च न्यायालय ने कहा, “फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश ने न केवल पत्नी को सबूत पेश करने का अधिकार जल्दबाजी में समाप्त करने के बाद बिना किसी सबूत के मामले का फैसला करके, बल्कि HMA के तहत दायर याचिका में SMA के वास्तविक प्रावधानों को लागू करके और आगे, SMA की क़ानून पुस्तिका में मौजूद न होने वाले प्रावधान पर भरोसा करके, इस मामले में अनुचित तरीके से कार्य किया।”
फैमिली कोर्ट जज की गंभीर त्रुटियां
- सबूत के बिना तलाक: फैमिली कोर्ट जज ने जल्दबाजी में पत्नी को सबूत पेश करने का अधिकार समाप्त कर दिया और कोई सबूत रिकॉर्ड किए बिना ही तलाक की डिक्री (Decree of Divorce) पारित कर दी।
- गलत कानून का प्रयोग: यह याचिका हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के तहत क्रूरता के आधार पर दायर की गई थी, लेकिन जज ने तलाक देने के लिए विशेष विवाह अधिनियम (SMA) के प्रावधानों को लागू कर दिया।
- गैर-मौजूद प्रावधान: जज ने तलाक देने के लिए SMA में एक ऐसे प्रावधान पर भरोसा किया जो कानून की किताब में मौजूद ही नहीं है।
‘समय बचाने’ की दलील खारिज
फैमिली कोर्ट के जज ने अपने फैसले के लिए यह औचित्य दिया था कि ऐसा कीमती न्यायिक समय बचाने और पक्षों को मुकदमेबाजी के एक और दौर से बचाने के लिए किया गया। उच्च न्यायालय ने इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया। खंडपीठ ने आगे कहा कि सुविधा या शीघ्रता के नाम पर कानून को एक तरफ नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इससे न्याय प्रशासन प्रणाली का अपरिहार्य पतन होगा।
कोर्ट ने कहा
“प्रस्तुत औचित्य, जो कि ‘न्यायिक समय बचाना’ प्रतीत होता है, प्रक्रिया या कानून में ऐसी मूलभूत त्रुटियों को वैध नहीं ठहरा सकता है। इस मामले में विद्वान फैमिली कोर्ट जज का समग्र आचरण बुनियादी कानूनी सिद्धांतों, वैधानिक प्रावधानों की उचित प्रयोज्यता और न्यायिक सीमाओं की परेशान करने वाली कमी को दर्शाता है।”
अनिवार्य ट्रेनिंग का आदेश
यह देखते हुए कि यही जज पहले भी कई मामलों में स्पष्ट वैधानिक आदेशों की लगातार अनदेखी कर चुके हैं, उच्च न्यायालय ने यह कड़ा निर्देश जारी किया। कहा, दिल्ली न्यायिक अकादमी (Delhi Judicial Academy) की देखरेख में जज को वैवाहिक कानून (Matrimonial Laws) में एक उचित और व्यापक ट्रेनिंग प्रोग्राम से गुजरना होगा। जब तक यह ट्रेनिंग पूरी नहीं हो जाती, तब तक जज को कोई भी वैवाहिक मामला नहीं लेने दिया जाएगा। उच्च न्यायालय ने इस जज के उस निष्कर्ष पर भी कड़ी आपत्ति व्यक्त की, जिसमें उन्होंने कहा था कि SMA के तहत किए गए विवाहों को “पवित्र मिलन (Holy Union) नहीं माना जा सकता।”







