उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- पिता ने अपने ही बच्चे को नकार दिया:जस्टिस पी. बी. बालाजी ने पिता के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अपने आदेश में कहा:“मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर पिता द्वारा यह लिखना कि उसका कोई बच्चा नहीं है, यह स्पष्ट रूप से पुष्टि करता है कि उसने अपने ही जैविक बच्चे को नकार दिया है। मैं प्रतिवादी/पिता को किसी भी तरह से नाबालिग बच्चे का अभिभावक (Guardian) बनने या उसके सर्वोत्तम हित में कार्य करने के लिए योग्य नहीं मानता।”
- बच्चे का कल्याण ही सर्वोपरि सिद्धांत (Welfare of the Child is Paramount):अदालत ने मां द्वारा प्रस्तुत रोजगार दस्तावेजों और उसकी ₹3.80 लाख प्रति माह की आय का अवलोकन करते हुए माना कि वह बच्चे के भरण-पोषण, स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा का खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम है।
- कनाडा ले जाने की अनुमति:अदालत ने माना कि चूंकि पिता ने बच्चे से अपने सारे संबंध व्यावहारिक रूप से खत्म कर लिए हैं, इसलिए बच्चे के भविष्य, विकास और सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) को ध्यान में रखते हुए मां को उसे कनाडा ले जाने की पूर्ण अनुमति दी जाती है।
चेन्नई: हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (Hindu Minority and Guardianship Act, 1956) तथा संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) के अंतर्गत नाबालिग संतान के सर्वोत्तम कल्याण के सिद्धांत (Welfare of the Minor Child), माता-पिता के आचरण द्वारा बच्चे की उपेक्षा/त्याग, मुलाक़ात अधिकारों (Visitation Rights) की अनदेखी, तथा कस्टडी प्राप्त अभिभावक द्वारा बच्चे को विदेश ले जाने (Relocation Abroad) के विधिक अधिकारों पर मद्रास उच्च न्यायालय ने एक स्पष्ट और कड़ा फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता मां द्वारा दायर कस्टडी याचिका को स्वीकार करते हुए व्यवस्था दी कि जिस पिता ने सार्वजनिक मंच पर अपनी जैविक संतान के अस्तित्व को ही नकार दिया हो, वह किसी भी दृष्टिकोण से बच्चे के सर्वोत्तम हित में कार्य करने या उसका कानूनी संरक्षक बनने के योग्य नहीं रह जाता है। अदालत ने वैवाहिक वेबसाइट पर खुद को ‘निःसंतान’ बताने वाले पिता की अभिभावक बनने की पात्रता को पूरी तरह खारिज करते हुए मां को नाबालिग बच्चे की स्थायी कस्टडी (Permanent Custody) प्रदान कर दी है और उसे अपने कार्यस्थल कनाडा ले जाने की अनुमति दे दी है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘वैवाहिक विज्ञापन में खुद को निःसंतान बताना बच्चे को बेदखल करने जैसा’
न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी ने पिता के आचरण पर गंभीर संज्ञान लेते हुए दर्ज किया: “प्रतिवादी-पिता द्वारा 25 अक्टूबर 2025 को tamilmatrimony.com पर यह विज्ञापन देना कि वह एक तलाकशुदा है और उसकी कोई संतान नहीं है (Divorcee with no children), स्पष्ट रूप से इस तथ्य की पुष्टि करता है कि पिता ने अपने ही नाबालिग बच्चे को त्याग दिया है (Disowned his own minor child)। मैं प्रतिवादी/पिता को किसी भी तरह से एक अभिभावक (Guardian) बनने या नाबालिग बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest) में कार्य करने के योग्य नहीं पाता हूँ।”
2. मां की वित्तीय व भावनात्मक क्षमता स्थापित:
- अदालत ने मां द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण किया, जिससे साबित हुआ कि वह कनाडा में एक प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत है और उसकी मासिक आय लगभग ₹3.80 लाख (Rs 3.80 lakh/month) है।
- पीठ ने माना कि मां बच्चे की सभी भरण-पोषण आवश्यकताओं, उत्कृष्ट शिक्षा और सुरक्षित भविष्य का खर्च स्वतंत्र रूप से उठाने में पूरी तरह सक्षम है।
3. पिता की घोर उदासीनता और अनिच्छा:
- अदालत ने नोट किया कि अदालत द्वारा पूर्व में मुलाकात के अधिकार (Visitation Rights) दिए जाने के बावजूद पिता ने बच्चे से मिलने या उसका हालचाल जानने में कभी कोई रुचि नहीं दिखाई।
- इसके अलावा, पिता ने वर्तमान कस्टडी याचिका का विरोध करने के लिए अदालत में उपस्थित होना भी जरूरी नहीं समझा, जो बच्चे के प्रति उसकी पूर्ण अरुचि को प्रमाणित करता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 2018 में जन्म और 2024 में तलाक
| विवरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
| संतान का जन्म | दंपत्ति के बच्चे का जन्म वर्ष 2018 में हुआ था। |
| विवाद एवं अलगाव | वैवाहिक विवादों के बाद मां अपने करियर और बेहतर अवसरों के लिए 2022 में कनाडा चली गई। जाने से पहले उसने बच्चे को भारत में अपने माता-पिता (नाना-नानी) की सुरक्षित देखरेख में छोड़ा था। |
| विवाह विच्छेद (तलाक) | आपसी मतभेदों के चलते दंपत्ति का विवाह वर्ष 2024 में कानूनी रूप से भंग (Dissolved) हो गया। |
| पिता का मैट्रिमोनियल विज्ञापन | 25 अक्टूबर 2025 को पिता ने पुनर्विवाह के उद्देश्य से ‘tamilmatrimony.com’ पर अपनी प्रोफाइल बनाई, जिसमें उसने घोषणा की कि वह “तलाकशुदा है और उसका कोई बच्चा नहीं है।” |
| कस्टडी याचिका | मां ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर बच्चे की स्थायी कस्टडी और उसे अपने साथ कनाडा ले जाने की अनुमति मांगी ताकि बच्चा अपनी मां के साथ रहकर अच्छी परवरिश पा सके। |
विधिक एवं न्यायिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- कल्याण का सिद्धांत सर्वोपरि (Welfare of the Child is Paramount):
- गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल (2008, सुप्रीम कोर्ट) में स्थापित सिद्धांत के अनुसार, कस्टडी के मामलों में माता-पिता के कानूनी अधिकारों से अधिक बच्चे का नैतिक, वित्तीय, शैक्षणिक और भावनात्मक कल्याण प्राथमिक विचारणीय बिंदु होता है।
- जहां एक पक्ष बच्चे की प्राथमिकताओं की उपेक्षा करता है और दूसरा पक्ष बेहतर जीवन व वित्तीय स्थिरता देने में सक्षम है, वहां कस्टडी समर्पित अभिभावक को ही सौंपी जाती है।
- माता-पिता का परित्याग और विधिक अयोग्यता:
- किसी बच्चे के अभिभावक के रूप में मान्यता पाने के लिए भावनात्मक जुड़ाव आवश्यक है। दूसरी शादी के लिए बच्चे के अस्तित्व को ही सार्वजनिक रूप से झुठला देना अभिभावकीय विफलता (Parental Alienation / Abandonment) की पराकाष्ठा है।
- कस्टडी के साथ बच्चे को विदेश ले जाने की अनुमति (Relocation Rights):
- भारतीय न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए कि मां विदेश में काम करती है, उसे बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि मां की आर्थिक और रहने की स्थिति सुदृढ़ है, तो बच्चे के समग्र विकास के लिए उसे मां के साथ विदेश जाने की अनुमति देना न्यायसंगत है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: माता (याचिकाकर्ता) बनाम पिता (प्रतिवादी) [संरक्षकता एवं मूल क्षेत्राधिकार याचिका – मद्रास उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: हालिया आदेश (अक्टूबर 2026)
- संबद्ध पक्षकार: कनाडा में सेवारत मां (आय: ₹3.80 लाख/माह) बनाम अलग रह रहा पिता
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) की धाराएं 7, 17 व 25
- हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (HMGA, 1956) की धारा 6 एवं 13 (नाबालिग का कल्याण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- बच्चे का कल्याण और माता-पिता की उपयुक्तता: ‘वैवाहिक लाभ के लिए बच्चे के अस्तित्व को सार्वजनिक रूप से नकारने वाला माता-पिता संरक्षक बनने की योग्यता खो देता है; वित्तीय रूप से सक्षम मां को कस्टडी और विदेश ले जाने का पूर्ण अधिकार है।’
- अंतिम परिणाम: याचिका पूर्णतः स्वीकार; मां को नाबालिग बच्चे की स्थायी कस्टडी प्रदान की गई और बच्चे को कनाडा ले जाने की औपचारिक विधिक अनुमति दी गई।
Minor Child: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति पी. बी. बालाजी |
| मुख्य विवाद | नाबालिग बच्चे (जन्म 2018) की स्थायी कस्टडी और विदेश (कनाडा) ले जाने की अनुमति |
| पिता का आचरण | tamilmatrimony.com पर खुद को “निःसंतान तलाकशुदा” (Divorcee with no children) विज्ञापित किया |
| मां की क्षमता | कनाडा में कार्यरत; मासिक आय ₹3.80 लाख (शिक्षा व भरण-पोषण में सक्षम) |
| अदालत का फैसला | मां को स्थायी कस्टडी मंजूर; पिता को गार्जियन बनने के अयोग्य ठहराया गया। |

