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Parental Responsibility: मां के समय व मेहनत की कोई कीमत नहीं लगा सकता…फिर आप कौन होते हैं कीमत लगाने वाले, पढ़ें बॉम्बे HC की यह टिप्पणी

Parental Responsibility: बॉम्बे हाई कोर्ट (नागपुर बेंच) ने भरण-पोषण (Maintenance) और बच्चों के पालन-पोषण को लेकर एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

नाबालिग बच्चे के भरण पोषण का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस उर्मिला जोशी-फालके की बेंच ने एक नाबालिग बच्चे द्वारा अपने पिता से भरण-पोषण बढ़ाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई ₹15,000 की राशि को बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक मां द्वारा बच्चे के पालन-पोषण में लगाए गए ‘समय और प्रयास’ का कोई मौद्रिक मूल्य (Monetary Value) नहीं लगाया जा सकता, और बच्चे के खर्चों की प्राथमिक जिम्मेदारी पिता की होती है।

गणित का फॉर्मूला नहीं है भरण-पोषण

  • कोर्ट ने साफ किया कि बच्चे के खर्चों को माता-पिता के बीच 50-50 के अनुपात में नहीं बांटा जा सकता।
  • मां का योगदान: जो मां बच्चे की कस्टडी रखती है, वह न केवल पैसा खर्च करती है, बल्कि अपना कीमती समय और ऊर्जा भी बच्चे के भविष्य निर्माण में लगाती है। इस मेहनत को पैसों में नहीं तौला जा सकता।
  • पिता की जिम्मेदारी: भले ही मां कमा रही हो (इस मामले में ₹70,000), लेकिन यह पिता (जो ₹1.5 लाख कमा रहा है) को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।

बच्चे के पालन-पोषण के लिए केवल धन की आवश्यकता नहीं होती। इसमें बहुत समय और प्रयास लगता है। यह कहना गलत होगा कि दोनों माता-पिता खर्चों के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं, विशेषकर जब मां समय का बड़ा निवेश कर रही हो। — बॉम्बे हाई कोर्ट

धारा 125 CrPC: सामाजिक न्याय का उपकरण

  • अदालत ने CrPC की धारा 125 (अब BNSS में समाहित) के उद्देश्य को रेखांकित किया।
  • सम्मानजनक जीवन: भरण-पोषण का उद्देश्य केवल ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ नहीं है, बल्कि बच्चे को वह गरिमापूर्ण जीवन देना है जिसका वह हकदार है।
  • समग्र विकास: इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पाठ्येतर गतिविधियां (Extracurricular activities) और सामाजिक विकास के खर्च शामिल होने चाहिए।

केस की पृष्ठभूमि (The Case Details)

  • माता-पिता का पेशा: दोनों ही मेडिकल प्रोफेशनल्स (डॉक्टर्स) हैं।
  • आय: पिता एक सीनियर मेडिकल ऑफिसर हैं जिनकी आय लगभग ₹1.5 लाख है, जबकि मां की आय ₹70,000 है।
  • विवाद: मां अकेले बच्चे का खर्च उठा रही थी। फैमिली कोर्ट ने केवल ₹15,000 का गुजारा भत्ता दिया था, जिसे हाई कोर्ट ने बहुत कम माना।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश (Key Highlights)

बिंदुविवरण
संशोधित राशि₹15,000 से बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह
बकाया (Arrears)यह राशि दिसंबर 2016 (आवेदन की तारीख) से देय होगी।
मुकदमा खर्चपिता को ₹10,000 मुकदमे के खर्च के रूप में अलग से देने होंगे।
अवधियह भुगतान तब तक जारी रहेगा जब तक बच्चा आत्मनिर्भर नहीं हो जाता।

कागजी दावों से ऊपर मानवीय वास्तविकता

यह फैसला उन पिताओं के लिए एक कड़ा संदेश है जो अपनी आय का हवाला देकर या पत्नी के कामकाजी होने का तर्क देकर बच्चों की जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि कानूनी लड़ाई केवल इस बात की नहीं है कि कागज पर कौन कितना कम कमाता है, बल्कि यह इस बात का आकलन है कि बच्चे के सर्वांगीण विकास का वास्तविक बोझ कौन उठा रहा है।

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