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Passive euthanasia: चिता मृत को जलाती है, पर चिंता जीवित को…पैसिव यूथेनेशिया को लेकर ऐतिहासिक फैसला आया है, पढ़ें

Passive euthanasia: भारत के कानूनी इतिहास में पहली बार, सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय व्यक्ति को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) देने की अनुमति दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) की अनुमति देते हुए न केवल कानूनी पहलुओं पर बात की, बल्कि उस मानवीय त्रासदी को भी रेखांकित किया जिससे उनका परिवार पिछले 12 वर्षों से गुजर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने ‘कॉमन कॉज’ मामले के दिशा-निर्देशों के तहत प्राथमिक और माध्यमिक मेडिकल बोर्ड की सहमति के बाद इस ‘मिसलेनियस एप्लीकेशन’ को स्वीकार कर लिया है। यह फैसला भारत में ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ के अधिकार की दिशा में एक मील का पत्थर है।

यह रहे कुछ अहम बिंदु

  1. परिवार के समर्पण की सराहना: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने अपने फैसले के अंत में विशेष नोट (Postscript) लिखा। अदालत ने कहा कि हरीश के माता-पिता और भाई-बहनों ने पिछले 12 से अधिक वर्षों तक उनकी जिस तरह से सेवा की, वह प्रेम और स्नेह का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने हरीश के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी। कानूनी रास्ता उन्होंने तभी चुना जब स्थिति ‘पॉइंट ऑफ नो रिटर्न’ (जहाँ से वापसी संभव न हो) पर पहुँच गई।
  2. संस्कृत श्लोक के जरिए बयां किया दर्द: पीठ ने परिवार की मानसिक पीड़ा को समझाने के लिए एक प्राचीन संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया। इसमें कहा-
    चिता चिंता द्वयोर्मध्य, चिंता तत्र गरीयसी। चिता दहति निर्जीवम, चिंता दहति सजीवकम्॥ इसका अर्थ है, चिता और चिंता (मानसिक फिक्र) के बीच, चिंता कहीं अधिक विनाशकारी होती है। चिता केवल निर्जीव शरीर को जलाती है, लेकिन चिंता जीवित व्यक्ति को भीतर से जला देती है। अदालत ने स्वीकार किया कि पिछले 12 वर्षों में परिवार ने जिस मानसिक ‘चिंता’ और ‘अग्नि’ का सामना किया है, उसकी कल्पना मात्र की जा सकती है।
  3. फैसले का मानवीय आधार: अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह निर्णय पूरी तरह से कानूनी सिद्धांतों और हरीश के ‘सर्वोत्तम हित’ (Best Interest) पर आधारित है, लेकिन इस कड़वी हकीकत को नजरअंदाज करना नासमझी होगी कि परिवार किस दर्द से गुजर रहा है। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि इस आदेश के कार्यान्वयन के बाद परिवार का दुख पूरी तरह खत्म तो नहीं होगा, लेकिन हरीश की वर्तमान पीड़ा को देखकर उन्हें जो मानसिक क्लेश होता है, वह कम हो जाएगा।

Life Support को हटाने का आदेश दिया

गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 12 सालों से कोमा में थे। अदालत ने उन्हें दी जा रही कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली (Life Support) को हटाने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने केंद्र सरकार से इस संवेदनशील विषय पर एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करने को भी कहा।

क्या है पैसिव यूथेनेशिया?

पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है—किसी मरणासन्न या लाइलाज मरीज को जीवित रखने के लिए दी जा रही चिकित्सा सहायता या लाइफ सपोर्ट को जानबूझकर बंद कर देना, ताकि उसे प्राकृतिक मृत्यु प्राप्त हो सके।

हरीश राणा की दर्दनाक कहानी

  • हादसा: 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हरीश राणा अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई थी।
  • हालत: तब से वे कोमा में थे और केवल ट्यूब के जरिए दिए जा रहे पोषण पर जीवित थे।
  • मेडिकल रिपोर्ट: AIIMS-दिल्ली के मेडिकल बोर्ड ने सर्वसम्मति से कहा कि इलाज जारी रखने से केवल उनकी जैविक उम्र बढ़ रही थी, रिकवरी की कोई संभावना नहीं थी।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • गरिमापूर्ण मृत्यु: कोर्ट ने AIIMS को निर्देश दिया कि लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया “मानवीय और गरिमापूर्ण” तरीके से पूरी की जाए।
  • माता-पिता का संघर्ष: पीठ ने हरीश के माता-पिता की सराहना करते हुए कहा, “उनके परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। उनका प्यार और देखभाल अतुलनीय है।”
  • न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्राथमिक और माध्यमिक मेडिकल बोर्ड लाइफ सपोर्ट हटाने की पुष्टि कर देते हैं, तो भविष्य में ऐसे मामलों में अदालती हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

कानूनी पृष्ठभूमि: अरुणा शानबाग से 2026 तक

  • 2011: सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले में इच्छा मृत्यु की याचिका खारिज की थी, लेकिन पैसिव यूथेनेशिया की संभावना के द्वार खोले थे।
  • 2018 और 2023: ‘कॉमन कॉज’ फैसले में कोर्ट ने ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना और इसके लिए ‘एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव’ (लिविंग विल) के नियम बनाए।

आगे का रास्ता

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) के पास पंजीकृत डॉक्टरों का एक पैनल होना चाहिए, ताकि सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड का गठन तेजी से किया जा सके।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
EXTRA-ORDINARY APPELLATE JURISDICTION
MISCELLANEOUS APPLICATION NO. 2238 OF 2025
IN SPECIAL LEAVE PETITION (CIVIL) NO. 18225 OF 2024
HARISH RANA VERSUS UNION OF INDIA & ORS.

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