Passport impounding case: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, जवाब की समय-सीमा से पहले पासपोर्ट जब्त करना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश (Single Judge) के पुराने आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता की रिट याचिका को पुनर्स्थापित (Restore) कर दिया है। पासपोर्ट जब्ती के एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि कोई अधिकारी जवाब देने की अवधि समाप्त होने से पहले ही आदेश पारित कर देता है, तो यह ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है।
मामला क्या था? (अगस्तता वेस्टलैंड घोटाला संदर्भ)
- यह मामला कारोबारी श्रवण गुप्ता से जुड़ा है, जिनका पासपोर्ट अगस्त 2021 में जब्त कर लिया गया था।
- ED का आरोप: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने आरोप लगाया था कि गुप्ता अगस्तता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले की जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
- प्रक्रियात्मक चूक: अधिकारियों ने गुप्ता को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) दिया था, जिसका जवाब देने की अंतिम तिथि 4 अगस्त 2021 थी। लेकिन, अधिकारियों ने एक दिन पहले यानी 3 अगस्त 2021 को ही पासपोर्ट जब्त करने का अंतिम आदेश पारित कर दिया।
अदालत की मुख्य और कड़ी टिप्पणियां
- अवसर की कमी: “अपीलकर्ता को जवाब देने के लिए पूरा समय न देना और उसके पिछले जवाबों पर विचार न करना, उसे निष्पक्ष अवसर देने से इनकार करने के समान है।”
- रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction): आमतौर पर हाई कोर्ट उन मामलों में दखल नहीं देते जहां वैकल्पिक कानूनी रास्ता (Appeal) मौजूद हो, लेकिन Whirlpool Corporation मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार— यदि प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हो, तो रिट याचिका सीधे सुनी जा सकती है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: कोर्ट ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि पासपोर्ट जब्त करने जैसी कार्यवाही के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का पालन अनिवार्य है।
यह होगा अगला कदम
डिवीजन बेंच ने एकल पीठ के 13 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द कर दिया है। अब इस रिट याचिका पर नए सिरे से सुनवाई होगी। अदालत ने ED को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है। याचिकाकर्ता को इस दौरान अंतरिम राहत (Interim Relief) के लिए आवेदन करने की छूट दी गई है।
प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) क्या है?
यह कानून का वह सिद्धांत है जो सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को बिना सुने सजा न दी जाए (Audi Alteram Partem), निर्णय लेने वाला पक्ष निष्पक्ष हो, प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का पर्याप्त समय और अवसर मिले।
| पक्ष | दलील |
| याचिकाकर्ता (विकास पाहवा और तनवीर अहमद मीर) | अधिकारियों की कार्रवाई मनमानी थी। सालों बाद वैधानिक अपील (Statutory Appeal) के लिए भेजना अनुचित है, जब आदेश ही अवैध है। |
| केंद्र सरकार और ED (ए.एस.जी. डी.पी. सिंह) | पासपोर्ट अधिनियम के तहत अपील का प्रभावी विकल्प मौजूद है, इसलिए रिट याचिका को खारिज किया जाना सही था। |

