Personal Liberty First: दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार (Right to Life) को सर्वोपरि रखते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच ने एक ऐसे जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान की है जो पहले से शादीशुदा होने के बावजूद लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और उन्हें परिवार से जान का खतरा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क (Adults) आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, तो उनकी वैवाहिक स्थिति (Marital Status) उनके सुरक्षा के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।
मामला क्या था? (The Background)
- पीड़ित पक्ष: याचिकाकर्ता महिला का आरोप था कि 2016 से उसका पति उसे प्रताड़ित कर रहा था। परेशान होकर उसने घर छोड़ दिया और फरवरी 2026 से हैदराबाद में अपने पार्टनर के साथ लिव-इन में रहने लगी।
- धमकी: महिला के परिवार और पति ने इस रिश्ते का विरोध किया और उन्हें ट्रैक कर डराना-धमकाना शुरू कर दिया। सुरक्षा की तलाश में यह जोड़ा दिल्ली आ गया।
- अदालत का रुख: कपल ने 11 मार्च को पुलिस को शिकायत दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
“वैवाहिक स्थिति” अप्रासंगिक (Marital Status Irrelevant)
- कोर्ट ने इस मामले में समाज और नैतिकता से ऊपर संविधान को रखने की बात कही।
- अनुच्छेद 21 का महत्व: संविधान का Article 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसमें यह नहीं देखा जाता कि व्यक्ति शादीशुदा है या नहीं।
- सहमति सर्वोपरि: “चूंकि दोनों याचिकाकर्ता वयस्क हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, इसलिए वे अदालत से सुरक्षा पाने के हकदार हैं।”
- सामाजिक नाराजगी बनाम संवैधानिक अधिकार: अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक असहमति या पारिवारिक दबाव के आधार पर किसी के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) में कटौती नहीं की जा सकती।
पुलिस को सख्त निर्देश
- तत्काल मदद: कपल को स्थानीय पुलिस अधिकारियों और SHO के संपर्क में रहने की अनुमति दी जाए।
- सुरक्षा के कदम: पुलिस कानून के अनुसार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी संभव कदम उठाए।
- क्षेत्राधिकार: यदि जोड़ा अपना पता बदलता है, तो उन्हें 3 दिन के भीतर स्थानीय पुलिस को सूचित करना होगा, और नई जगह की पुलिस भी उन्हें सुरक्षा देने के लिए बाध्य होगी।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विषय | अदालत का निष्कर्ष |
| मुख्य तर्क | जीवन का अधिकार (Right to Life) किसी भी सामाजिक स्थिति से ऊपर है। |
| निजी मामला | कोर्ट ने उनके बीच हुए MoU या उनके पिछले वैवाहिक जीवन की वैधता पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। |
| पुलिस की भूमिका | राज्य (State) ने सुरक्षा देने का आश्वासन दिया और कोर्ट ने इसे अनिवार्य बनाया। |
| संदेश | पारंपरिक मानदंडों से बाहर के रिश्तों को भी संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है। |
निष्कर्ष: व्यक्तिगत स्वायत्तता की जीत
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उस बढ़ती कानूनी सोच को पुख्ता करता है जो व्यक्तिगत पसंद (Individual Choice) को सबसे ऊपर रखती है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि भले ही कोई व्यक्ति अपनी पिछली शादी से कानूनी रूप से अलग न हुआ हो, लेकिन उसे अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ बिना किसी डर के रहने का पूरा हक है।

