Sunday, August 30, 2026
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Justice Over Delay: वकील की गलती की सजा मुवक्किल को नहीं…छत्तीसगढ़ HC ने जमीन विवाद में दी राहत, देरी माफ करने का आदेश

Justice Over Delay: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने न्याय के सिद्धांत को दोहराते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि वकील की लापरवाही (Negligence of Lawyer) का खामियाजा मुवक्किल (Litigant) को नहीं भुगतना चाहिए।

हाईकोर्ट के जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने बलौदाबाजार जिले के एक भूमि विवाद मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में उदार दृष्टिकोण (Liberal Approach) अपनाना चाहिए जहाँ वकील की निष्क्रियता के कारण पक्षकार अदालत में उपस्थित नहीं हो पाया। अदालत ने माना कि एक बार जब कोई पक्षकार वकील नियुक्त कर देता है, तो वह यह मानकर चलने का हकदार है कि उसका वकील अदालत में उसका सही प्रतिनिधित्व करेगा।

मामला क्या था? (The Miscommunication)

  • विवाद: कमल प्रसाद कासर ने जयराम दुबे और जमीन खरीदने वालों (प्रतिवादियों) के खिलाफ सिविल सूट फाइल किया था। आरोप था कि दुबे ने फर्जी ‘पॉवर ऑफ अटार्नी’ के जरिए जमीन बेच दी है।
  • एकतरफा फैसला (Ex-parte Decree): मुकदमे के दौरान प्रतिवादियों के वकील ने उन्हें कार्यवाही की सही जानकारी नहीं दी, जिसके कारण वे सबूत पेश करने के चरण में शामिल नहीं हो पाए। ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ एकतरफा फैसला सुना दिया।
  • अपील में देरी: जब खरीदारों को तहसीलदार के नोटिस से फैसले का पता चला, तो उन्होंने अपील करने के निर्देश दिए। लेकिन उनके वकील ने फाइल केवल दूसरे वकील को फॉरवर्ड कर दी और समय पर अपील दाखिल नहीं की गई।

हाई कोर्ट का कानूनी तर्क (Legal Rational)

  • निचली अदालत ने “समय सीमा” (Limitation Period) का हवाला देते हुए देरी माफ करने से इनकार कर दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे पलट दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट का हवाला: हाई कोर्ट ने ‘रफीक बनाम मुंशीलाल (1981)’ मामले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि निर्दोष पक्षकार को उसके वकील की चूक के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
  • भरोसे का अधिकार: कोर्ट ने कहा कि मुवक्किल से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हर वक्त अपने वकील पर ‘वॉचडॉग’ (Watchdog) की तरह नजर रखे या कार्यवाही की लगातार निगरानी करे।
  • उदार दृष्टिकोण: यदि वकील की लापरवाही के कारण देरी हुई है, तो तकनीकी आधार पर न्याय का गला नहीं घोंटा जाना चाहिए।

प्रक्रियात्मक सुधार (Procedural Relief)

  • देरी माफ: हाई कोर्ट ने अपील दाखिल करने में हुई देरी को माफ (Condone) कर दिया है।
  • पुनर्विचार का आदेश: ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह Order 9 Rule 13 (एकतरफा फैसले को रद्द करने का प्रावधान) और Section 5 (Limitation Act) के तहत दिए गए आवेदनों पर मेरिट के आधार पर फिर से विचार करे।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निष्कर्ष
वकील की भूमिकावकील का प्रतिनिधित्व मुवक्किल के भरोसे पर आधारित है।
तकनीकी बाधाकेवल समय सीमा की तकनीकी अड़चन के कारण न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
मुवक्किल की स्थितिमुवक्किल को ‘वॉचडॉग’ बनने की आवश्यकता नहीं है।
नतीजानिचली अदालत को मामले पर दोबारा सुनवाई करने का निर्देश।

निष्कर्ष: न्याय की प्राथमिकता

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला उन हजारों मुवक्किलों के लिए एक बड़ी राहत है जो अक्सर अपने वकीलों की लापरवाही या संवाद की कमी के कारण कानूनी लड़ाई हार जाते हैं। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून का उद्देश्य न्याय करना है, न कि प्रक्रियाओं के जाल में उलझकर किसी के अधिकारों को खत्म करना।

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