HomeLaworder HindiPOCSO Case Default Bail: 60 दिन की देरी का मतलब ऑटोमैटिक बेल...

POCSO Case Default Bail: 60 दिन की देरी का मतलब ऑटोमैटिक बेल नहीं…पॉक्सो आरोपी की याचिका खारिज कर कहा, पीड़ित का हित सर्वोपरि

POCSO Case Default Bail: कर्नाटक हाई कोर्ट ने POCSO (पॉक्सो) और अन्य गंभीर अपराधों के मामलों में ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ (Default Bail) को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की बेंच ने एक 27 वर्षीय आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। आरोपी पर एक नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाने और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे गंभीर आरोप थे। अदालत ने कहा कि कानून में जांच पूरी करने के लिए दी गई 60 दिनों की समयसीमा का उल्लंघन होने पर आरोपी को अपने आप जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता, यदि आरोप पत्र (Charge sheet) 90 दिनों के भीतर दाखिल कर दिया गया हो।

मामला: 60 बनाम 90 दिन की कानूनी जंग

  • गिरफ्तारी: आरोपी को 14 अक्टूबर, 2025 को गिरफ्तार किया गया था।
  • आरोपी का तर्क: कानून (BNS/CrPC) कहता है कि कुछ विशेष अपराधों में जांच 60 दिनों में पूरी होनी चाहिए। चूंकि पुलिस ने 60 दिन में चार्जशीट दाखिल नहीं की, इसलिए उसे ‘स्टैच्यूटरी बेल’ (Statutory Bail) मिलनी चाहिए।
  • चार्जशीट की स्थिति: पुलिस ने गिरफ्तारी के 84वें दिन चार्जशीट दाखिल की थी।

कोर्ट का निष्कर्ष: 60 दिन की सीमा पीड़ित के लिए है, आरोपी के लिए नहीं

  • अदालत ने धारा 187 (डिफ़ॉल्ट बेल) और धारा 193 (जांच की समयसीमा) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।
  • स्पीड ट्रायल: कोर्ट ने माना कि धारा 193(2) का उद्देश्य त्वरित जांच सुनिश्चित करना है, लेकिन यह आरोपी को डिफ़ॉल्ट बेल का अधिकार नहीं देता।
  • 90 दिन का नियम: चूंकि पॉक्सो और अन्य संबंधित धाराओं में सजा 10 वर्ष या उससे अधिक है, इसलिए पुलिस के पास आरोप पत्र दाखिल करने के लिए कानूनी रूप से 90 दिनों का समय होता है।
  • अधूरा आरोप पत्र: कोर्ट ने आरोपी की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि DNA या फोरेंसिक रिपोर्ट न होने से चार्जशीट अधूरी मानी जाए। कोर्ट ने कहा कि मुख्य रिपोर्ट समय पर आने से बेल का अधिकार खत्म हो जाता है।

कानूनी संदेश: कानूनी खामियों का लाभ नहीं

जस्टिस नागप्रसन्ना ने स्पष्ट किया कि जांच की समयसीमा का निर्धारण पीड़ित के अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया है ताकि उसे जल्द न्याय मिले। इसे आरोपी के लिए जेल से बाहर निकलने के “एस्केप रूट” (Escape Route) के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
आरोपी की मांग60 दिन बीतने पर ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ की मांग।
कोर्ट का जवाब10 साल से अधिक की सजा वाले केस में 90 दिन की सीमा लागू होगी।
चार्जशीट की स्थिति84वें दिन दाखिल की गई, जो 90 दिन की सीमा के भीतर है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी60 दिन की समयसीमा पीड़ित के हित के लिए है, आरोपी को रिहा करने के लिए नहीं।

गंभीर अपराधों में कड़ी व्याख्या

यह फैसला उन आरोपियों के लिए एक बड़ा झटका है जो तकनीकी आधार पर (जैसे जांच में मामूली देरी) जेल से बाहर आने की कोशिश करते हैं। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पॉक्सो जैसे जघन्य अपराधों में अदालतें प्रक्रियात्मक देरी के बजाय अपराध की गंभीरता और कानून की व्यापक भावना को प्राथमिकता देंगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
haze
30 ° C
30 °
30 °
74 %
4.1kmh
0 %
Sun
32 °
Mon
44 °
Tue
45 °
Wed
45 °
Thu
44 °

Recent Comments