PREMATURE RELEASE Case: मद्रास हाई कोर्ट ने साफ किया है कि दोषी कैदियों की समयपूर्व रिहाई (premature release) पर फैसला केवल सरकार ले सकती है।
जुबैथा बेगम सहित 13 याचिकाकर्ताओं की अर्जियां खारिज
कोर्ट में इसे अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सजा सुनाए जाने के बाद कैदी अब अदालत की कस्टडी में नहीं रहता, इसलिए बेल या इंटरिम बेल की मांग अदालत से नहीं की जा सकती। जस्टिस एन. सतिश कुमार और जस्टिस एम. जोथिरामन की बेंच ने जुबैथा बेगम सहित 13 याचिकाकर्ताओं की अर्जियों को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में उनके रिश्तेदारों को इंटरिम बेल देने की मांग की गई थी, जबकि उनकी समयपूर्व रिहाई की अर्जी सरकार के पास लंबित थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
- सजा होने के बाद कैदी कोर्ट की कस्टडी में नहीं: बेंच ने कहा, “जब दोषी कैदी सजा काट रहा होता है, तब वह कोर्ट की कस्टडी में नहीं होता। इसलिए बेल या इंटरिम बेल देने का सवाल ही नहीं उठता।”
- कोर्ट नहीं, सरकार तय करेगी समयपूर्व रिहाई: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समयपूर्व रिहाई पर फैसला सरकार को विभिन्न कारकों के आधार पर करना होता है। इसलिए इसे कोर्ट में सीधे “अधिकार” बताकर नहीं मांगा जा सकता।
- केवल ‘Suspension of Sentence’ का विकल्प: कोर्ट के मुताबिक, अधिकतम राहत तमिलनाडु Suspension of Sentence Rules, 1982 के तहत “sentence suspension” हो सकती है—बेल नहीं।
हाई कोर्ट का संकेत — सरकार को ज्यादा सक्रिय होना होगा
बेंच ने कहा कि फुल बेंच के ‘Yesu केस’ में पहले ही तय किया जा चुका है कि सरकार Rule 40 के तहत अपने विवेक से कैदियों को अस्थायी रिहाई या सजा निलंबन दे सकती है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “अब समय आ गया है कि सरकार इस पावर का उपयोग करे। ऐसे मामलों को इंटरिम बेल के लिए अदालत में लाने की कोई जरूरत नहीं है। जब सजा सुनाने का काम पूरा हो चुका हो, तब कोर्ट के पास इंटरिम बेल देने की शक्ति ही नहीं है।”
कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कीं
कोर्ट ने कहा कि जब मामला सरकार के पास विचाराधीन हो, तब Article 226 के तहत इंटरिम बेल या लीव मांगने वाली रिट याचिकाएं बिल्कुल मेंटेन करने योग्य नहीं हैं।

