PRISONERS RIGHTS: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जेलों में बंद कैदियों, चाहे वे दिव्यांग हों या नहीं, को उनकी पसंद का या महंगा खाना न मिलना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 21 पर चर्चा
शीर्ष कोर्ट ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सभी कैदियों को प्राप्त है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे व्यक्तिगत या लग्जरी खाने की मांग कर सकते हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि किसी कैदी को उसकी पसंद का या महंगा खाना नहीं दिया गया, इसे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता। राज्य का दायित्व है कि वह हर कैदी को, चाहे वह दिव्यांग हो या नहीं, पर्याप्त, पोषणयुक्त और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त भोजन उपलब्ध कराए, बशर्ते इसकी चिकित्सकीय जरूरत हो।
जेल सुधारों की जरूरत पर जोर
कोर्ट ने कहा कि जेलें सुधार गृह होती हैं, न कि आम समाज की सुविधाओं का विस्तार। गैर-जरूरी या विलासिता की चीजें न देना तब तक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, जब तक इससे कैदी के स्वास्थ्य या गरिमा को कोई नुकसान न हो। फैसले में कहा गया, “भारत में जेलों की मौजूदा व्यवस्था और ढांचा खासकर दिव्यांग कैदियों की जरूरतों को पूरा करने में बेहद कमजोर है। जबकि आधुनिक दंड सिद्धांत सजा की बजाय पुनर्वास को प्राथमिकता देते हैं।”
दिव्यांग कैदी की याचिका पर आया फैसला
यह फैसला एडवोकेट एल. मुरुगनाथम की याचिका पर आया, जो बेकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी से पीड़ित हैं। उन्हें एक जमीन विवाद के चलते जेल में रहना पड़ा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि जेल में उन्हें रोजाना अंडा, चिकन और ड्राई फ्रूट जैसे प्रोटीनयुक्त भोजन और जरूरी इलाज नहीं मिला। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जेल में सुविधाओं की कमी सीधे तौर पर संबंधित अधिकारियों की गलती नहीं है, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि जेल सुधारों की तत्काल जरूरत है, खासकर दिव्यांगों के अनुकूल ढांचे और प्रक्रियाओं को लागू करने की।
दिव्यांग कैदियों के लिए विशेष व्यवस्था जरूरी
कोर्ट ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों को वही स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए जो सामान्य समाज में उपलब्ध हैं। इसमें फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, मानसिक इलाज और व्हीलचेयर, हियरिंग एड या बैसाखी जैसे सहायक उपकरण शामिल हैं। जेल प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से समन्वय कर इन सुविधाओं को सुनिश्चित करे। सिर्फ वित्तीय या लॉजिस्टिक कारणों से इनसे इनकार नहीं किया जा सकता।
राज्य की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकतर राज्यों की जेल नियमावली पुरानी हो चुकी है और दिव्यांग कानूनों या अधिकार आधारित सोच से अनभिज्ञ हैं। इनमें अक्सर शारीरिक या इंद्रिय संबंधी दिव्यांगता को मानसिक बीमारी से जोड़ दिया जाता है, जिससे दिव्यांग कैदियों के कानूनी अधिकारों का हनन होता है। अंत में कोर्ट ने कहा कि राज्य की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह दिव्यांग कैदियों के अधिकारों की रक्षा करे। इसमें भेदभाव रहित व्यवहार के साथ-साथ उनके पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण की व्यवस्था भी शामिल है।

