याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें
- निजता और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन:याचिका में तर्क दिया गया कि अभियोजन अधिकारियों के लिए आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण अनिवार्य करना संविधान के अनुच्छेद 21 (निजता का अधिकार / Right to Privacy) और अनुच्छेद 14 (मनमानेपन के खिलाफ अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है।
- अदालत के अधिकारी होने का तर्क (BNSS 2023):याचिका में कहा गया:“अभियोजन अधिकारी, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18 और 19 के तहत नियुक्त अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) हैं। उनका मुख्य काम अदालत कक्ष (Courtroom) में होता है और उनकी उपस्थिति दैनिक न्यायिक आदेश पत्रों (Judicial Order Sheets) में दर्ज की जाती है।”
- प्रशासनिक प्रक्रिया में खामी:
- पूर्व में हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत गृह विभाग के समक्ष अभियोजन अधिकारियों ने अपना अभ्यावेदन (Representation) दिया था।
- गृह विभाग ने 30 सितंबर के अपने निर्णय में अधिकारियों के बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और निजता संबंधी आक्षेपों का कोई उचित कारण या समाधान दिए बिना ही उनके आवेदन को खारिज कर दिया था।
नई दिल्ली: लोक अभियोजकों (Public Prosecutors), अपर लोक अभियोजकों (Addl. PPs) और सहायक लोक अभियोजकों (APPs) के संवैधानिक व विहित विधिक दर्जे, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत ‘अदालत के अधिकारी’ (Officers of the Court) के रूप में उनकी भूमिका, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मौलिक अधिकार (Right to Privacy), तथा आधार अधिनियम, 2016 के तहत प्रमाणीकरण के नियमों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को ‘दिल्ली प्रोसीक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन’ (Delhi Prosecutors Welfare Association) द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्थगनादेश पारित किया। अभियोजन निदेशालय द्वारा 5 अक्टूबर 2026 को जारी परिपत्र के अनुसार, सभी अभियोजकों को 12 अक्टूबर से AEBAS पोर्टल पर अनिवार्य पंजीकरण कराकर बायोमेट्रिक हाजिरी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने मामले की अगली विस्तृत सुनवाई दिसंबर 2026 में तय की है। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के उस विवादित आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है, जिसके तहत सभी अभियोजन अधिकारियों के लिए ‘आधार-सक्षम बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम’ (AEBAS) के माध्यम से दैनिक हाजिरी लगाना अनिवार्य कर दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रमुख विधिक तर्क एवं संवैधानिक आपत्तियां
एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन, आशीष मोहन और सचिन पुरी (सहायक अधिवक्ता: कुशल कुमार, आदित्य कपूर, ऋषभ सक्सेना एवं हर्ष आहूजा) ने दिल्ली सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए निम्नलिखित प्रमुख विधिक बिंदु उठाए:
1. ‘अदालत के अधिकारी’ (Officers of the Court) की गरिमा और कार्य-प्रकृति
- याचिका में रेखांकित किया गया कि लोक अभियोजक सामान्य प्रशासनिक या लिपिकीय कर्मचारी नहीं हैं:“अभियोजन अधिकारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18 और धारा 19 के तहत नियुक्त अदालत के स्वतंत्र अधिकारी (Officers of the Court) हैं। उनका प्राथमिक कार्य अदालती कक्ष (Courtrooms) में न्याय प्रशासन में सहयोग करना है, और उनकी उपस्थिति प्रतिदिन न्यायिक आदेश-पत्रों (Judicial Order Sheets) में विधिवत दर्ज की जाती है।”
- ऐसे अधिकारियों को सामान्य कार्यालयीन कर्मचारियों की तरह गेट पर बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाने या आधार ऑथेंटिकेशन के लिए बाध्य करना उनके स्वतंत्र न्यायिक दायित्वों और पद की गरिमा के प्रतिकूल है।
2. निजता का अधिकार (अनुच्छेद 21) एवं आधार अधिनियम, 2016 का उल्लंघन
- याचिका में दलील दी गई कि किसी भी सरकारी कार्मिक के बायोमेट्रिक डेटा को अनिवार्य रूप से आधार प्रमाणीकरण तंत्र से जोड़ना सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी (निजता का अधिकार) और आधार (संवैधानिक वैधता) निर्णयों में निर्धारित आनुपातिकता की कसौटी (Proportionality Test) पर खरा नहीं उतरता।
- आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7 के तहत आधार प्रमाणीकरण केवल सरकारी संचित निधि से दिए जाने वाले प्रत्यक्ष लाभों, सब्सिडी या सेवाओं के लिए अनिवार्य किया जा सकता है; इसे सेवारत न्यायिक/विधिक अधिकारियों की दैनिक उपस्थिति के लिए थोपना सांविधिक शक्तियों का अतिक्रमण और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना कदम है।
3. गृह विभाग द्वारा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी
- एसोसिएशन ने इससे पूर्व भी हाजिरी परिपत्रों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 17 अगस्त को हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे इसे एक प्रतिवेदन (Representation) मानें और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देकर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लें।
- हालांकि, गृह विभाग ने निर्धारित 4 सप्ताह की समय-सीमा बीतने के बाद 15 सितंबर को औपचारिक सुनवाई की और 30 सितंबर के मिनट्स (Minutes) के जरिए बिना कोई कारण दर्ज किए (Without recording reasons) और आधार प्रमाणीकरण पर सदस्यों की विधिक आपत्तियों का समाधान किए बिना ही प्रतिवेदन को खारिज कर दिया।
- इसके तुरंत बाद 5 अक्टूबर को अभियोजन निदेशक ने 12 अक्टूबर से अनिवार्य बायोमेट्रिक प्रणाली लागू करने का नया फरमान जारी कर दिया, जिसके विरुद्ध वकीलों को पुनः अदालत का रुख करना पड़ा।
उच्च न्यायालय का आदेश एवं अंतरिम राहत
- 5 अक्टूबर के आदेश पर तत्काल रोक: न्यायमूर्ति अमित महाजन ने एसोसिएशन के तर्कों में प्रथम दृष्टया दम पाते हुए 5 अक्टूबर के उस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी, जिसके तहत अभियोजकों को 12 अक्टूबर से AEBAS पर पंजीकरण और हाजिरी लगाना अनिवार्य किया गया था।
- दिसंबर 2026 में अगली सुनवाई: अदालत ने दिल्ली सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए मामले को अंतिम निस्तारण हेतु दिसंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18 एवं 19:
- धारा 18 उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालयों के लिए लोक अभियोजक (PP) और अतिरिक्त लोक अभियोजक (Addl. PP) की नियुक्ति का प्रावधान करती है।
- धारा 19 मजिस्ट्रेट अदालतों के लिए सहायक लोक अभियोजकों (APP) की नियुक्ति का नियमन करती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने शिवनंदन पासवान और बाबू बनाम केरल राज्य में स्पष्ट किया है कि लोक अभियोजक कार्यपालिका के मात्र मुखपत्र या आज्ञाकारी कर्मचारी नहीं हैं; वे निष्पक्ष न्याय के संरक्षक और न्यायालय के अधिकारी हैं।
- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017 & 2018 – 5-जज संविधान पीठ):
- बायोमेट्रिक डेटा किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और सूचनात्मक निजता (Informational Privacy) का संवेदनशील हिस्सा है।
- राज्य द्वारा बायोमेट्रिक पहचान अनिवार्य करने के लिए तीन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है: (1) वैध विधिक कानून, (2) वैध राज्य हित, और (3) आनुपातिकता (Proportionality)। जहां उपस्थिति साबित करने के लिए न्यायिक आदेश पत्रक (Order Sheets) पहले से मौजूद हों, वहां बायोमेट्रिक दबाव आनुपातिक नहीं माना जा सकता।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दिल्ली प्रोसीक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति अमित महाजन (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई: दिसंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (एसोसिएशन) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन, आशीष मोहन एवं सचिन पुरी, साथ में अधिवक्ता कुशल कुमार, आदित्य कपूर, ऋषभ सक्सेना एवं हर्ष आहूजा।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धाराएं 18 एवं 19 (अभियोजन अधिकारियों की विधिक नियुक्ति)
- आधार (वित्तीय और अन्य सहायिकियों, प्रसुविधाओं और सेवाओं का लक्षित परिदान) अधिनियम, 2016 — धारा 7 एवं 8
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता/मनमानेपन पर रोक), अनुच्छेद 19(1)(d) एवं अनुच्छेद 21 (निजता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ (2017 & 2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है; बायोमेट्रिक अनिवार्यताओं का आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है।’
- अंतिम परिणाम: दिल्ली सरकार के 5 अक्टूबर 2026 के सर्कुलर पर दिल्ली हाईकोर्ट का अंतरिम स्थगनादेश; लोक अभियोजकों के लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक हाजिरी (AEBAS) की अनिवार्यता पर दिसंबर 2026 तक रोक।
Public Prosecutors:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति अमित महाजन) |
| याचिकाकर्ता | दिल्ली प्रोसीक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन, आशीष मोहन व सचिन पुरी) |
| चुनौतीपूर्ण आदेश | अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) का 5 अक्टूबर 2026 का परिपत्र |
| मुख्य कानूनी आधार | संविधान का अनुच्छेद 21 (निजता का अधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता/मनमानापन) और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण का मुद्दा |
| कोर्ट का आदेश | अनिवार्य बायोमेट्रिक उपस्थिति पर रोक; अगली सुनवाई दिसंबर में |

