Tuesday, October 13, 2026
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Role of Women: बुजुर्ग पुरुष मुकदमे के लिए युवा महिला पर निर्भर नहीं हो सकते; अपीलीय अदालत की ऐसी टिप्पणी लैंगिक रूप से पक्षपाती और पूरी तरह महिला-विरोधी है

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और तल्ख टिप्पणियां

  1. “अटकलों पर आधारित और स्त्री-विरोधी टिप्पणी”:न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला ने अपीलीय जज के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए 1 अक्टूबर के आदेश में लिखा:“अपील खारिज करने का आधार प्रथम अपीलीय अदालत का एक inherently gender-biased दावा है कि परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य मुकदमे के लिए किसी महिला पर निर्भर नहीं हो सकते। यह अवलोकन विशिष्ट रूप से स्त्री-विरोधी (Misogynistic) है और परिवार की महिला सदस्य की क्षमताओं को कम आंकता है।”
  2. बिना साक्ष्य का मौका दिए फैसला गलत:हाईकोर्ट ने माना कि विलंब माफी के आवेदन में बीमारी का आधार खारिज करने से पहले पक्षकारों को साक्ष्य (Medical Evidence) प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए था। साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देना किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले अनिवार्य (Sine Qua Non) था।
  3. मामले को रिमांड (Remand) करने का आदेश:हाईकोर्ट ने द्वितीय अपील स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और मामले को वापस एडीजे कोर्ट भेज दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि:
    • पक्षकारों को विलंब माफी के आवेदन पर अपनी बीमारी के साक्ष्य पेश करने का मौका दिया जाए।
    • यदि विलंब को माफ कर दिया जाता है, तो अपील की योग्यता (Merits of the Case) पर सुनवाई कर कानून के अनुसार फैसला सुनाया जाए।

जबलपुर (मध्य प्रदेश): पारिवारिक मुकदमों में महिलाओं की निर्णयकारी भूमिका और नेतृत्व (Role of Women in Handling Family Litigation), न्यायिक निर्णयों में लैंगिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता (Gender Bias and Stereotyping in Judicial Orders), परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत अपील में हुई देरी को माफ करने (Condonation of Delay under Section 5 of Limitation Act) के विधिक मानकों, तथा साक्ष्य पेश करने का उचित अवसर दिए बिना निष्कर्ष निकालने की प्रक्रियात्मक खामी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रगतिशील निर्णय सुनाया है।

पैतृक संपत्ति विवाद से जुड़ी द्वितीय अपील स्वीकार

न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की एकल पीठ ने पारित अपने विस्तृत आदेश में पैतृक संपत्ति विवाद से जुड़ी द्वितीय अपील (Second Appeal) को स्वीकार करते हुए अपीलीय अदालत के दृष्टिकोण को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ऐसी अवांछित और संशयवादी टिप्पणियां केवल अनुमानों और पूर्वग्रहों (Surmises and Assumptions) पर आधारित हैं, जिन्हें कानून की नजर में कभी भी मान्यता नहीं दी जा सकती। उच्च न्यायालय ने प्रथम अपीलीय अदालत (एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज) की उस टिप्पणी को कठोर शब्दों में “स्त्री-द्वेषी” (Misogynistic) और “लैंगिक रूप से पक्षपाती” करार दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य पारिवारिक मुकदमे की पैरवी के लिए किसी युवा महिला सदस्य पर निर्भर नहीं हो सकते।’

उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘टिप्पणी ठेठ महिला-विरोधी है और महिलाओं की क्षमता को कम आंकती है’

न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला ने प्रथम अपीलीय अदालत के आदेश के आधारभूत तर्क पर सख्त ऐतराज जताते हुए दर्ज किया: “अपील की देरी माफी अर्जी को खारिज करने के लिए प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा दिया गया आधार स्वाभाविक रूप से एक लैंगिक रूप से पक्षपाती (Inherently Gender-Biased) दावा है कि परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य पारिवारिक मुकदमे में आवश्यक कदम उठाने के लिए किसी छोटी/युवा महिला सदस्य पर निर्भर नहीं हो सकते। यह टिप्पणी विशिष्ट रूप से महिला-विरोधी (Typically Misogynistic) है और परिवार की एक महिला सदस्य की क्षमता और सामर्थ्य को कमजोर व कमतर आंकती है।”

2. ‘अपीलीय अदालत का निष्कर्ष केवल अनुमान और धारणा पर आधारित’:

पीठ ने रिकॉर्ड की पड़ताल करते हुए अपीलीय न्यायाधीश के आचरण की आलोचना की: “अपीलीय अदालत के रिकॉर्ड में ऐसे तर्क को सही ठहराने का कोई आधार मौजूद नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलीय अदालत ने केवल अनुमानों और धारणाओं (Surmises and Assumptions) के आधार पर ऐसी अवांछित (Unwarranted) और संशयवादी टिप्पणी करने का दुस्साहस किया, जिसे कानून के तहत कतई अनुमोदित नहीं किया जा सकता।”

3. साक्ष्य का अवसर दिए बिना बीमारी का आधार खारिज करना गलत (Sine Qua Non):

  • अपीलकर्ताओं ने अपील दाखिल करने में हुई 18 दिनों की देरी का कारण बताते हुए कहा था कि मुकदमे की संपूर्ण पैरवी संभाल रही महिला सदस्य गंभीर रूप से अस्वस्थ थी।
  • अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी थी कि बीमारी का कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया।
  • इस पर हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी:“यह निष्कर्ष निकालने से पहले कि अपीलकर्ता देरी के आधार को साबित करने में विफल रहे हैं, उन्हें साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देना एक अनिवार्य पूर्व-शर्त (Sine Qua Non) थी।”
  • अदालत ने कहा कि तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय न्याय की व्यापक भावना के तहत विचार किया जाना चाहिए था।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: पैतृक संपत्ति और 18 दिनों की देरी

विवरणतथ्य एवं न्यायिक कालक्रम
विवाद की प्रकृतिपैतृक संपत्ति (Ancestral Property) में हिस्सेदारी की मांग को लेकर महिला वंशजों के कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा दायर दीवानी वाद (Civil Suit)।
ट्रायल कोर्ट का फैसलाट्रायल कोर्ट ने मामले की मेरिट पर सुनवाई करते हुए वाद खारिज कर दिया था, यह पाते हुए कि वादी यह साबित करने में विफल रहे कि संपत्ति वास्तव में पैतृक थी।
प्रथम अपील में विधिक अड़चनवादियों ने फैसले की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के बाद अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (ADJ) की अदालत में प्रथम अपील दायर की। हालांकि, अपील परिसीमा अवधि (Limitation Period) से 18 दिन विलंब से दाखिल हुई।
देरी माफी का आधार (धारा 5)वादियों ने परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत आवेदन कर बताया कि मुकदमे के सभी विधिक कार्य और पैरवी परिवार की एक महिला सदस्य संभाल रही थी, जो फैसले के बाद गंभीर रूप से बीमार हो गई थी, जिसके कारण 18 दिन की देरी हुई।
प्रथम अपीलीय अदालत का रवैयाअपीलीय अदालत ने बिना साक्ष्य का अवसर दिए और यह कहते हुए देरी माफी अर्जी खारिज कर दी कि ‘परिवार में बुजुर्ग पुरुष सदस्य होते हुए कोई महिला पर निर्भर कैसे हो सकता है’, और बिना मेरिट सुने पूरी अपील खारिज कर दी।
हाईकोर्ट में द्वितीय अपीलअपीलकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील दायर कर दलील दी कि अपीलीय अदालत ने न्यायोचित दृष्टिकोण के बजाय अत्यधिक तकनीकी और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया।

उच्च न्यायालय के अंतिम निर्देश एवं आदेश

  1. द्वितीय अपील स्वीकार: हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा अपील खारिज किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया।
  2. मामला रिमांड (Remand): मामले को वापस प्रथम अपीलीय अदालत को पुनर्विचार हेतु भेजा गया।
  3. साक्ष्य पेश करने का अवसर: अपीलीय अदालत को निर्देश दिया गया कि वह दोनों पक्षों को देरी माफी आवेदन (Section 5 Application) के संबंध में साक्ष्य (दस्तावेज/गवाह) पेश करने का उचित अवसर प्रदान करे और विधि अनुसार निर्णय ले।
  4. गुण-दोष पर सुनवाई: यदि 18 दिनों की देरी माफ कर दी जाती है, तो अदालत दोनों पक्षों को सुनकर प्रथम अपील का निपटारा उसके गुण-दोष (Merits) के आधार पर करेगी।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • सर्वोच्च न्यायालय की लैंगिक रूढ़िवादिता से निपटने की हैंडबुक (Handbook on Combating Gender Stereotypes):
    • भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जारी इस ऐतिहासिक मार्गदर्शिका में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि न्यायाधीशों को अपने फैसलों में महिलाओं के संबंध में पारंपरिक और पितृसत्तात्मक धारणाओं—जैसे कि ‘महिलाएं कानूनी या वित्तीय मामलों का प्रबंधन नहीं कर सकतीं’ या ‘परिवार का संचालन केवल पुरुष करते हैं’—का उपयोग करने से पूरी तरह बचना चाहिए। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह आदेश इसी संवैधानिक चेतना को पुष्ट करता है।
  • परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 (पर्याप्त कारण – Sufficient Cause):
    • कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम काटीजी (1987, सुप्रीम कोर्ट) में स्थापित सिद्धांत के अनुसार, अदालतों को परिसीमा की धारा 5 पर विचार करते समय व्यावहारिक और न्याय-उन्मुख (Substantial Justice) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, न कि अत्यधिक तकनीकी। 18 दिनों जैसी मामूली देरी, जहां गंभीर बीमारी का आधार लिया गया हो, साक्ष्य का मौका दिए बिना सीधे खारिज नहीं की जा सकती।
  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 100:
    • कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न (Substantial Question of Law) के तहत प्रक्रियात्मक न्याय की अनदेखी और पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणियों को उच्च न्यायालय द्वितीय अपील में दुरुस्त करने का पूर्ण अधिकार रखता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: अपीलकर्तागण (महिला वंशजों के कानूनी वारिस) बनाम प्रतिवादीगण [द्वितीय अपील – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
  • विवादित आदेश: अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (प्रथम अपीलीय अदालत) का आदेश, जिसमें 18 दिनों की देरी पर अपील खारिज की गई थी।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 5 (विलंब माफी हेतु पर्याप्त कारण)
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 96 (प्रथम अपील) एवं धारा 100 (द्वितीय अपील)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 व 15 (लैंगिक समानता और गैर-भेदभाव)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक आचरण और लैंगिक संवेदनशीलता: ‘अदालतों को अनुमानों के आधार पर महिलाओं की कानूनी क्षमता को कमतर नहीं आंकना चाहिए; मामूली प्रक्रियात्मक देरी पर तकनीकी अड़चनों के बजाय मूल न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।’
  • अंतिम परिणाम: द्वितीय अपील स्वीकार; प्रथम अपीलीय अदालत की महिला-विरोधी टिप्पणी निरस्त; मामला पुनः साक्ष्य और सुनवाई हेतु अपीलीय अदालत को रिमांड किया गया।

Role of Women:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर पीठ)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला
मामले की प्रकृतिपैतृक संपत्ति विवाद से जुड़ी सिविल द्वितीय अपील (Second Appeal)
निचली अदालत की टिप्पणी“परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य मुकदमे की पैरवी के लिए महिला सदस्य पर निर्भर नहीं हो सकते।”
हाईकोर्ट का निष्कर्षअपीलीय अदालत की टिप्पणी “लैंगिक पूर्वाग्रह” और “अटकलों पर आधारित” है।
अदालत का फैसलाअपील मंजूर; मामला प्रथम अपीलीय अदालत को पुनर्विचार (Remand Back) हेतु वापस भेजा गया।
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