Friday, October 9, 2026
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SC-ST Act Ruling: जाति सूचक का एक शब्द भी अपराध के लिए काफी…कहा- पब्लिक व्यू में दी गई गाली, यह मामला जरूर पढ़ें

SC-ST Act Ruling: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने SC/ST अधिनियम के तहत जाति-सूचक अपशब्दों के इस्तेमाल पर एक बहुत ही सख्त और स्पष्ट कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश सेखरी की बेंच ने स्पष्ट किया कि SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(s) के तहत अपराध तब माना जाएगा जब कोई गैर-SC/ST व्यक्ति, किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य को उसकी “जाति के नाम से” सार्वजनिक स्थान पर अपमानित करे। कोर्ट ने कहा है कि यदि सार्वजनिक रूप से किसी दलित या आदिवासी व्यक्ति के खिलाफ जाति आधारित एक भी अपशब्द का प्रयोग किया जाता है, तो वह इस कानून के तहत अपराध मानने के लिए काफी है; शब्दों की संख्या या वाक्य की लंबाई मायने नहीं रखती।

कोर्ट का महत्वपूर्ण सिद्धांत (The “Single Word” Rule)

  • लंबाई मायने नहीं रखती: कोर्ट ने कहा कि अपशब्द चाहे एक शब्द का हो या एक से अधिक, यदि वह पीड़ित की ‘जाति पहचान’ को निशाना बनाता है, तो वह अपराध की श्रेणी में आएगा।
  • पब्लिक व्यू (Public View): यह अपशब्द किसी ऐसे स्थान पर कहा जाना चाहिए जहाँ आम जनता इसे देख या सुन सके।
  • नियत (Intent): आरोपी को यह पता होना चाहिए कि पीड़ित SC/ST समुदाय से है और उसने जानबूझकर उसकी पहचान को निशाना बनाया हो।

अग्रिम जमानत पर रोक (Bar on Anticipatory Bail)

  • अदालत ने कानून की उस धारा को दोहराया जो इस एक्ट के तहत आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से रोकती है।
  • धारा 18: यदि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अपराध बनता दिखता है, तो अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) नहीं दी जा सकती।
  • अपवाद: हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि शुरुआती जांच में जाति-आधारित अपमान का कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, तो यह रोक लागू नहीं होगी।

इस विशेष मामले में क्या हुआ? (The Evidence Gap)

  • हैरानी की बात यह है कि सिद्धांत तय करने के बावजूद, कोर्ट ने इस मामले के आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी। इसका कारण साक्ष्यों की कमी थी।
  • वीडियो रिकॉर्डिंग: कोर्ट ने खुद उस घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रेस कॉन्फ्रेंस देखी जिसे पुलिस ने सबूत के तौर पर पेश किया था।
  • हिंसा दिखी, गाली नहीं: कोर्ट ने पाया कि वीडियो में आरोपी मारपीट (Assault) करता तो दिख रहा है, लेकिन पूरी रिकॉर्डिंग में कहीं भी ‘जाति-सूचक अपशब्द’ का प्रयोग सुनाई नहीं दिया।
  • नतीजा: चूंकि ‘जाति आधारित अपमान’ का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं मिला, इसलिए कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत पर लगी कानूनी रोक (Statutory Bar) यहाँ लागू नहीं होती।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत की व्यवस्था
अपशब्द की मात्राएक अकेला जाति-सूचक शब्द भी FIR के लिए पर्याप्त है।
सामान्य गाली बनाम जातिगत गालीअचानक हुए झगड़े में दी गई सामान्य गाली इस एक्ट में नहीं आएगी; निशाना ‘जाति’ होनी चाहिए।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यवीडियो या ऑडियो में स्पष्ट रूप से अपमानजनक शब्दों का होना जरूरी है।
अग्रिम जमानतअगर केस प्रथम दृष्टया झूठा लगे या सबूत न हों, तो कोर्ट बेल दे सकता है।

निष्कर्ष: कानून की व्याख्या और सुरक्षा

हाई कोर्ट का यह फैसला दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ यह पीड़ितों को सुरक्षा देता है कि छोटे से छोटे जातिगत अपमान को भी गंभीरता से लिया जाएगा। दूसरी तरफ, यह जांच एजेंसियों को भी आगाह करता है कि केवल धाराएं लगा देना काफी नहीं है, अदालत में ठोस डिजिटल या मौखिक साक्ष्य पेश करना अनिवार्य है।

HIGH COURT OF JAMMU & KASHMIR AND LADAKH
AT JAMMU
CORAM: HON’BLE MR. JUSTICE RAJESH SEKHRI, JUDGE
CRM(M) No. 63/2026
Santosha Devi v/s UT of J&K & Ors.

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